ओ गुरु! मेरे गुरु!
ये सफ़र भी क्या सफ़र था—
जहाँ रास्ते थे धुँधले,
पर तेरे शब्दों में
प्रकाश का असर था।
जब दुनिया ने
मेरे सवालों को अहंकार समझा,
मेरी खामोशी को हार समझा—
तू तब भी मेरे पास रहा,
जैसे अंधेरे में
दीपक का उजाला रहा।
ओ गुरु! मेरे गुरु!
कितनी बार टूटा हूँ मैं—
और तूने बिना डाँटे
मुझे जोड़ दिया।
कितनी बार भटका हूँ मैं—
और तूने एक वाक्य में
मुझे राह दिखा दिया।
लोग बदलते रहे
मौसम की तरह,
रिश्ते गिरते रहे
पतझड़ की तरह…
पर तू—
तू वो शिखर रहा
जो तूफ़ान में भी
स्थिर रहता है।
तूने मुझे
हार से नहीं—
हौसले से मिलाया,
तूने मुझे
भीड़ से नहीं—
स्वयं से मिलाया।
ओ गुरु! मेरे गुरु!
अगर मैं कभी नाम बनूँ,
तो दुनिया को बताना—
मेरी पहचान की जड़ में
कहीं तेरे आशीर्वाद का
जल भी है।
और अगर मैं गिर जाऊँ
किसी दिन—
तो लोगों से कह देना,
मैं अकेला नहीं गिरा,
मेरे भीतर
गुरु का दिया हुआ साहस
जगा हुआ था।
ओ गुरु! मेरे गुरु!
तू सिर्फ़ सिखाता नहीं,
तू संवारता है,
तू केवल रास्ता नहीं देता,
तू नज़र देता है—
जिससे इंसान खुद को
पहचानता है।
मेरे भीतर जो भी अच्छा है,
उसमें तेरी सीख का रंग है…
और मेरे जीवन की हर जीत में
तेरे आशीर्वाद की
गूंज है।
ओ गुरु! मेरे गुरु!
बस यूँ ही साथ रहना—
मेरी सोच के आकाश में
एक सूरज की तरह,
क्योंकि
तेरा होना ही
मेरे लिए
सबसे बड़ी शिक्षा है।— पुष्प सिरोही
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