क्या मैं तुम्हें धूप भरी सुबह कह दूँ?
पर सुबह तो बदलती है, ढलती है, थकती है—
कभी हवा रूठ जाती है, कभी धूप जलती है,
कभी फूलों की हँसी भी पल भर में चुकती है।
दिन भी अक्सर ज़्यादा तप जाता है,
और उसकी चमक भी संध्या में खो जाती है—
मगर तुम्हारा नूर किसी मौसम-सा नहीं,
जो आया… और फिर बिखर कर सो जाता है।
तुम्हारी आँखों की शांति में
एक स्थिर उजाला है,
जिसे समय भी छूकर
कमज़ोर नहीं कर पाता।
कहाँ टिकती है दुनिया की हर एक रौनक?
कहाँ ठहरता है चेहरों का रंग हमेशा?
वक़्त सबको धीरे-धीरे
धुंध में बदल देता है—
पर तुम्हारा असर
मेरे भीतर वैसा ही ताज़ा।
अगर उम्र की परछाईं
कभी तुम्हारे माथे को छू ले,
अगर दिन की थकान
कभी तुम्हारे होंठों तक आ ले—
तब भी तुम्हारी गरिमा
मेरे मन में कम न होगी,
क्योंकि तुम रूप नहीं—
एक भावना हो, एक रोशनी हो।
और इसीलिए
मैं तुम्हें किसी मौसम से नहीं तौलता—
मैं तुम्हें शब्दों में रख देता हूँ,
जहाँ पतझड़ नहीं आता।
जब तक सांसें चलेंगी,
जब तक अक्षर जिंदा रहेंगे,
तुम्हारा ये सौंदर्य
इन पंक्तियों में
अमर रहेगा।
— पुष्प सिरोही
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