क्योंकि मैं मृत्यु के लिए रुक न सका—
वह खुद मेरे दरवाज़े तक आई,
काली नहीं थी…
बस बेहद शांत,
जैसे किसी पुराने दोस्त की तरह
जो बिना दस्तक भी
अपना हक़ जानता हो।
उसके पास एक रथ था—
और उसके भीतर
मेरे अलावा कोई नहीं,
बस एक और साया…
जिसका नाम था—
अनंत।
हम धीरे चले—
मृत्यु को जल्दी किस बात की?
और मैं—
मैंने भी जेब से
अपनी सारी व्यस्तताएँ निकालकर
रख दीं किनारे…
काम, जीत, हार,
लोगों की राय,
और "कल" की हड़बड़ी…
सब कुछ।
हम गुज़रे उन गलियों से
जहाँ मैं कभी जवान था—
जहाँ मैंने
पहली बार अपने नाम पर भरोसा किया था।
हम गुज़रे उस मैदान से
जहाँ पुरुष
अपने अहंकार को
तलवार की तरह घुमाते हैं—
और उसे ही
हिम्मत समझ बैठते हैं।
हम गुज़रे उन घरों से—
जहाँ हँसी की आवाज़
अब भी आती है—
पर मेरे लिए
वो आवाज़
हमेशा दरवाज़ा खोलती।
हम गुज़रे खेतों के पास से—
जहाँ फसलें खड़ी थीं
जैसे किसी पूजा में
हाथ जोड़कर खड़ी प्रार्थनाएँ।
और फिर…
हम गुज़रे ढलते सूरज से—
या शायद
सूरज ही
हमसे आगे निकल गया।
ठंड धीरे-धीरे
मेरे कंधों पर उतर आई…
मेरे कपड़े
इतने भारी नहीं थे
जितनी मेरी
आँखों में छुपी यादें।
और मृत्यु—
वो अब भी
विनम्र थी…
जैसे मेरी साँसों का सम्मान
उसे किसी संस्कार की तरह आता हो।
फिर हम रुके—
एक ऐसे घर के सामने
जो घर नहीं था…
धरती का उठा हुआ सीना था,
छत दिखाई नहीं देती थी,
और दीवारें
मिट्टी से बनी खामोशी थीं।
मैं कुछ देर
बस उसे देखता रहा—
और पहली बार
समझा कि
जीवन का सबसे बड़ा सत्य
लंबा नहीं होता…
साफ़ होता है।
मृत्यु ने
कुछ नहीं कहा,
बस रथ ने
अपनी दिशा बदल ली—
धीरे… और धीरे…
दूर… और दूर…
किसी ऐसी राह पर
जहाँ
समय
नाम की चीज़
रुक जाती है।
तब मुझे लगा—
मैं हार नहीं रहा,
मैं लौट रहा हूँ…
अपनी शुरुआत की तरफ,
उस बिंदु की तरफ
जहाँ आत्मा
कभी थकती नहीं।
और अब—
सदियाँ नहीं,
कुछ ही क्षण बीते हैं शायद…
क्योंकि
जिस दिन मैंने
मृत्यु के साथ चलना स्वीकार किया,
उसी दिन
मैंने जाना—
मरना अंत नहीं,
अहंकार का विसर्जन है। ---पुष्प सिरोही
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