एक दिन तुम लौटोगी—
थकी हुई नहीं,
बस… अपने ही भीतर से बाहर निकलकर,
जैसे कोई लड़की
बरसों बाद अपनी हँसी को
फिर से पहचान लेती है।
एक दिन तुम अपने ही घर में
चुपके से कदम रखोगी,
और तुम्हारा ही दिल
तुम्हें देखकर मुस्कुराएगा—
"आ गई?
कहाँ चली गई थी इतनी देर? "
उस दिन
मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा,
मैं तुम्हें नहीं बाँधूँगा,
मैं तुम्हें "मेरा" कहकर
तुम्हारे माथे पर
कोई दाग नहीं लगाऊँगा।
मैं बस तुम्हारे पास बैठूँगा
एक शांत दोस्त की तरह—
और धीरे से कहूँगा,
"अब खुद से मिल लो…"
देखो—
यह तुम हो,
जो अपने ही कंधों पर
अपनी ही उम्मीद का बोझ रखकर
अजनबी हो गई थीं।
देखो—
यह तुम्हारे भीतर का वो कमरा है
जहाँ तुम्हारी आँखें
बरसों से रोशनी का इंतज़ार कर रही थीं।
आज
उस कमरे के दरवाज़े खोल दो,
और एक-एक करके
वे नाम वापस ले लो
जो तुम्हारे होने से छीन लिए गए थे—
तुम्हारा आत्मसम्मान,
तुम्हारी आज़ादी,
तुम्हारी सादगी,
तुम्हारी चमक,
और वो भरोसा…
जो किसी ने तोड़ा था,
लेकिन जो तुम्हारा था।
मैं चाहता हूँ
तुम अपने भीतर
अपने ही लिए
एक त्योहार मनाओ।
अपने पुराने दुखों को
एक कुर्सी पर बैठाओ,
उन्हें पानी दो,
और फिर उनसे कहो—
"तुम मुझे सिखा गए,
अब तुम जा सकते हो…"
क्योंकि अब
तुम्हें किसी के प्यार में
खुद को खोने की ज़रूरत नहीं—
अब तुम्हें
प्यार बनना है।
और सुनो…
अपने भीतर की उस लड़की को खोजो
जो हर बार टूटकर भी
किसी नई सुबह की तरफ
चल देती थी।
उस लड़की को बताना—
कि अब उसे
खुद को साबित नहीं करना,
किसी के सामने झुकना नहीं,
किसी के लिए कम होना नहीं।
अब उसे बस
अपने जैसा होना है।
एक दिन
तुम आईने के सामने खड़ी होकर
खुद को देखोगी—
और पहली बार
तुम्हें अपनी आँखों में
भीख नहीं,
चाहत नहीं,
डर नहीं…
बस सच्चाई दिखेगी।
उस दिन तुम कहोगी—
"मैं ठीक हूँ।
मैं पूरी हूँ।"
और वही दिन होगा
जब तुम्हारे भीतर
किसी के जाने का शोर नहीं,
किसी के आने की भूख नहीं—
बस
स्वयं की शांति होगी।
मैं जानता हूँ—
तुमने खुद को
कितनी बार दूसरों को देकर
खुद से कुछ भी नहीं माँगा।
तुमने अपने सपनों को
घर के कोनों में रख दिया,
तुमने अपनी हँसी को
कमरे के पर्दों के पीछे छुपा दिया।
पर अब नहीं।
अब तुम
अपनी हँसी को वापस बुलाओ।
अपनी आवाज़ को वापस बुलाओ।
अपनी आँखों को वापस बुलाओ।
उन सब हिस्सों को वापस बुलाओ
जो तुम्हें छोड़ दिए गए थे।
और फिर…
जब तुम पूरी तरह
अपने पास लौट आओ,
तब मेरे पास आना—
ज़रूरत बनकर नहीं,
कमी बनकर नहीं,
किसी घाव का सहारा बनकर नहीं…
बल्कि
चुनाव बनकर।
क्योंकि प्रेम
वही शुद्ध होता है
जो मजबूरी नहीं होता।
मैं तुम्हें "बचाना" नहीं चाहता।
मैं तुम्हें "जीतना" नहीं चाहता।
मैं तुम्हें "हासिल" नहीं करना चाहता।
मैं बस
तुम्हारे भीतर की उस रानी को
सलाम करना चाहता हूँ
जो अपनी ही जंग से लौटकर
अपना ही ताज
खुद पहनती है।
तो आओ…
एक मेज़ लगाओ अपने भीतर—
एक कप चाय रखो,
अपनी पसंदीदा खुशबू लगाओ,
और अपने दिल के दरवाज़े पर
खुद को बुलाओ।
आज
तुम स्वयं की मेहमान हो।
आज
तुम स्वयं का उत्सव हो।
और आज
मैं तुम्हें बस इतना कहूँगा—
"स्वागत है…"
उस स्त्री का
जो दुनिया को नहीं—
पहले
खुद को जीतकर आई है।
और अंत में,
जब सब शोर शांत हो जाए,
जब सारी आवाज़ें थक जाएँ,
जब सब रिश्ते
अपनी-अपनी सीमाओं में सिमट जाएँ—
तब तुम अपने ही भीतर
एक आवाज़ सुनोगी—
धीमी, साफ़, पवित्र—
"मैं हूँ…"
और यही होगा
तुम्हारा
सबसे बड़ा प्रेम।
प्यार के बाद प्यार।
---पुष्प सिरोही
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