लता Poem by Pushp Sirohi

लता

प्रिये—
मैं तुम्हें
लता की तरह चाहता हूँ।

जैसे लता
किसी दीवार से
लड़ती नहीं—
बस उसे
अपना सहारा बना लेती है।

वैसे ही
मैं भी
तुम्हारे पास
किसी अधिकार की तरह नहीं,
किसी भरोसे की तरह आता हूँ—
और तुम्हारी मौजूदगी में
अपना आकाश पा लेता हूँ।

तुम्हारा प्रेम
मेरे लिए
एक बेल है—
जो मेरे भीतर
धीरे-धीरे चढ़ती है,
और मेरी सूनी जगहों में
हरियाली भर देती है।

मैंने कई बार
जीवन की धूप देखी है,
कई बार
हवा का रूख बदला है—
पर तुम्हारा हाथ
मेरे लिए
वो तना है
जो कभी टूटने नहीं देता।

जब मैं थकता हूँ,
तो तुम्हारी आवाज़
मेरे माथे पर
ठंडी छाँव बनकर उतरती है।

जब मैं बिखरता हूँ,
तो तुम्हारी आँखें
मुझे
फिर से जोड़ देती हैं।

तुम्हारे बिना
मैं एक खाली दीवार हूँ—
जिस पर
कोई मौसम नहीं चढ़ता।

पर तुम्हारे साथ
मैं एक आँगन हूँ—
जहाँ
हर सुबह
नई कली खिलती है।

और सुनो…
लता को
सिर्फ सहारा नहीं चाहिए,
उसे प्यार भी चाहिए—
थोड़ा धूप,
थोड़ा पानी,
थोड़ी देखभाल।

इसी तरह
मेरे प्रेम को भी
सिर्फ "मिलना" नहीं चाहिए,
मुझे तुम्हारा
"ठहरना" चाहिए।

तुम बस
पास रहो—
मेरी दीवार बनकर नहीं,
मेरे घर की
खुशबू बनकर।

और मैं
लता की तरह
हर दिन
तुम्हारे नाम पर
और ऊँचा चढ़ जाऊँगा—
धीरे-धीरे…
पर हमेशा।

— पुष्प सिरोही

लता
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