जिस्म के बिना मोहब्बत Poem by Pushp Sirohi

जिस्म के बिना मोहब्बत

तुम पूछती हो—
"क्या ये संभव है
कि कोई पास आए
और दिल दूर रहे? "

मैं चुप हो जाता हूँ…
क्योंकि कुछ सच
आवाज़ नहीं चाहते।

हाँ, संभव है।
कई लोग
जिस्म को पा लेते हैं,
पर रूह तक
कभी पहुंचते ही नहीं।

मैंने देखा है
कैसे हँसी उधार होती है,
कैसे बाँहें
बस आदत बन जाती हैं,
कैसे "करीब" होना
केवल दूरी का
दूसरा नाम रह जाता है।

और फिर
सुबह होते ही
लोग अपने कपड़ों की तरह
अपनी भावनाएँ भी
समेट लेते हैं—
जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

पर सुनो…
मैं तुम्हें
ऐसा प्रेम नहीं दे सकता
जिसमें "शरीर" तो हो
पर "इंसान" न हो।

मैं तुम्हें
ऐसा स्पर्श नहीं दे सकता
जिसके बाद
तुम्हारी आँखें
खाली रह जाएँ।

मैं तुम्हें
ऐसे पास नहीं बुला सकता
जहाँ मेरा दिल
तुमसे झूठ बोले।

हाँ, ये भी सच है—
कभी-कभी
लोगों को
सिर्फ भूख होती है,
और भूख
भजन नहीं गाती,
वो बस
माँगती है।

पर प्रेम…
प्रेम माँगता नहीं,
प्रेम ठहरता है,
प्रेम देखता है,
प्रेम पूछता है—
"क्या तुम ठीक हो? "

तुम्हारा शरीर
मेरे लिए
कोई जीत नहीं,
कोई ट्रॉफी नहीं—
वो एक मंदिर है
जहाँ प्रवेश
इज़्ज़त से होता है।

और अगर
इज़्ज़त नहीं…
तो फिर
चुप रहना बेहतर है,
दूर रहना बेहतर है।

मैं तुम्हें
वो रात नहीं दूँगा
जो सुबह
अजनबी बन जाए।

मैं तुम्हें
वो पल नहीं दूँगा
जो बाद में
पछतावा बन जाए।

मैं तुम्हें
पास तभी बुलाऊँगा
जब मैं
तुम्हारे नाम के साथ
अपने दिल को भी
रख सकूँ।

क्योंकि
जिस्म के बिना प्रेम
कहानी अधूरी है—
और
प्रेम के बिना जिस्म
बस एक खाली शोर है।

और मैं—
मैं शोर नहीं बनना चाहता,
मैं तुम्हारी जिंदगी में
सुकून बनना चाहता हूँ।

— पुष्प सिरोही

जिस्म के बिना मोहब्बत
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