प्रिये—
मैं तुम्हें सिर्फ चाहता नहीं,
मैं तुम्हें अपने भीतर
धीरे-धीरे स्थिर करता हूँ—
जैसे दीपक की लौ
आँधी के बाद भी
अपना सच बचा लेती है।
मैंने दुनिया देखी है—
यहाँ लोग मुस्कान को प्रेम समझ लेते हैं,
और वादों को आदत…
पर तुम…
तुम उस प्रेम जैसी हो
जो वजह नहीं पूछता,
बस निभना जानता है।
तुम्हारा नाम
मेरे होठों पर नहीं,
मेरी सांसों की लिखावट में है—
मैं बोलूँ या चुप रहूँ,
मेरे अंदर
तुम्हारी ही आवाज़ रहती है।
तुम्हारी आँखों में
मैं अपना कल देखता हूँ,
और तुम्हारी खामोशी में
मैं अपना सुकून सुनता हूँ।
मैं तुम्हें
सोने-चाँदी के उपहार नहीं दूँगा,
मैं तुम्हें
अपनी मौजूदगी दूँगा—
वो मौजूदगी
जो भीड़ में भी
तुम्हें अकेला न पड़ने दे।
अगर कभी जीवन
कठोर हो जाए,
अगर लोग
हमारे प्रेम को तौलें,
तो सुनो—
मैं तुम्हारे लिए
किला बन जाऊँगा,
और मेरी दीवारें
इज़्ज़त और वफ़ा से बनी होंगी।
मेरा प्रेम
शोर नहीं करता,
दिखावा नहीं करता,
मेरे प्रेम में
बस एक सच्ची बात है—
मैं तुम्हें हर दिन चुनता हूँ…
और हर दिन, पहले से ज़्यादा।
कभी उम्र आ जाए,
कभी चेहरे बदल जाएँ,
कभी हाथ काँप जाएँ—
तो भी मेरा प्यार
कम नहीं होगा,
क्योंकि मैंने तुम्हें
चेहरे से नहीं—
रूह से चाहा है।
और आख़िर में
मैं बस इतना कहूँगा—
तुम मेरे जीवन की
सबसे सुंदर आदत हो,
और मेरी रूह की
सबसे शांति-भरी जगह।
— पुष्प सिरोही
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