उस दिन
कुछ भी खास नहीं था—
न कोई जश्न,
न कोई बड़ी बात,
बस मैं था…
और शहर की साधारण सी सड़कें।
मैं निकला था
यूँ ही,
खुद से मिलने,
अपने भीतर की थकान को
थोड़ा बहलाने।
और फिर
एक छोटी-सी दुकान पर
मुझे दिखा—
संतरे।
चमकीले,
खुशबूदार,
जैसे धूप
फल बनकर
टोकरी में रख दी गई हो।
मैंने दो खरीदे।
तुम्हें पता है?
कुछ चीज़ें
बहुत मामूली होकर भी
अचानक
ज़िन्दगी बदल देती हैं।
मैंने एक संतरा
वहीं,
चलते-चलते छील लिया—
और उसकी खुशबू ने
मेरे भीतर
एक बंद खिड़की खोल दी।
रस की पहली बूंद
जैसे कह रही थी—
"देखो,
अब भी
मीठा बचा है।"
फिर मैं
अचानक तुम्हें याद करने लगा।
कोई दुख वाली याद नहीं—
बस एक प्यारी-सी बात,
कि अगर तुम साथ होतीं
तो तुम हँसतीं,
और कहतीं—
"इतना बच्चा भी कोई होता है
जो सड़क पर संतरा छीलता है? "
और मैं कहता—
"हाँ…
जब दिल भारी हो
तो संतरा हल्का कर देता है।"
मैंने दूसरा संतरा
घर ले आया।
जैसे मैं
कोई बड़ा तोहफा नहीं,
बस एक छोटा सा
‘तुम्हारे नाम'
ले आया हूँ।
फ्रिज में रखा,
फिर निकाला,
फिर वापस रख दिया—
क्योंकि मैं चाहता था
ये पल
थोड़ा और चले।
उस शाम
मैंने चाय नहीं पी।
मैंने कोई गीत नहीं चलाया।
मैंने कोई किताब नहीं खोली।
मैं बस
संतरे के साथ बैठा रहा—
और पहली बार
बहुत दिनों के बाद
ठीक महसूस किया।
कितनी अजीब बात है न?
ज़िन्दगी
हमेशा बड़े-बड़े कारणों से नहीं बदलती—
कभी-कभी
एक संतरा,
एक हल्की हवा,
एक छोटी मुस्कान
हमारी आत्मा को
फिर से जीवित कर देती है।
और हाँ,
मैंने वो दूसरा संतरा
तुम्हारे लिए नहीं छोड़ा
क्योंकि तुम
भूखी हो—
मैंने वो छोड़ा
क्योंकि तुम
मेरी ख़ुशी का
सबसे सरल कारण हो।
अगर तुम आतीं
तो मैं तुम्हें
वो संतरा खिलाता,
और कहता—
"देखो…
दुनिया में
जितनी भी कड़वाहट है,
उसके बीच
कुछ मिठास
अब भी बची है।"
और तुम
संतरे की एक फांक लेकर
मेरी तरफ देखतीं—
और सिर्फ़ इतना कहतीं,
"हाँ…
और वो मिठास
तुम्हारी आँखों में भी है।"
उस दिन
कुछ भी खास नहीं था—
फिर भी
सब खास हो गया।
बस दो संतरे थे…
और एक छोटा सा एहसास—
कि खुशी
कभी-कभी
इतनी सस्ती होती है
कि हम उसे महँगी समझकर
देखते ही नहीं।
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