बड़े मज़े में देखता हूँ, इन गली के आवारा फकीरों को,
जो सड़कों की धूल छानकर, कोसते हैं अपनी लकीरों को।
सारा दिन यूँ ही भटकते हैं, जैसे कोई बड़ा काम हो,
मगर जेब में फूटी कौड़ी नहीं, बस आवारागर्दी का नाम हो।
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