सपने जीवित रखो Poem by Pushp Sirohi

सपने जीवित रखो

सपने जीवित रखो…
क्योंकि सपने मर जाएँ,
तो जीवन—
बस साँसों की गिनती बनकर रह जाता है।

सपने जीवित रखो…
क्योंकि सपने टूटें,
तो इंसान बाहर से चलता है,
पर भीतर से ठहर जाता है।

जिस दिन सपने बुझते हैं,
उस दिन आँखों की चमक
धुएँ में बदल जाती है,
और हौसलों की आवाज़
धीरे-धीरे ख़ामोश हो जाती है।

सपने जीवित रखो…
वरना जीवन उस पंछी-सा बन जाएगा
जिसके पंख तो हैं,
पर उड़ान नहीं…
आसमान सामने है,
पर हिम्मत नहीं…

सपने जीवित रखो…
वरना जीवन उस खेत-सा बन जाएगा
जो बर्फ़ में दब गया हो—
जहाँ हर बीज
अपने ही भीतर मर जाता है,
और हर सुबह
शाम से हार जाती है।

सपने केवल चाह नहीं,
सपने इरादे हैं…
सपने भीतर की आग हैं,
जो अँधेरों में भी रास्ता दिखाती है।

सपने वो जिद हैं
जो गिरने के बाद
फिर उठना सिखाती है…
सपने वो शपथ हैं
जो हार के सामने
सर झुकने नहीं देती।

इसलिए…
थक जाओ तो भी सपने न छोड़ना,
टूट जाओ तो भी सपने न छोड़ना,
दुनिया मना करे तो भी सपने न छोड़ना…

क्योंकि
सपने ही जीवन की धड़कन हैं।
और जिस दिन धड़कन रुकती है,
उस दिन शरीर जीवित रहता है—
पर जीवन नहीं। ----पुष्प सिरोही

सपने जीवित रखो
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success