आओ भारत गढ़ें Poem by Pushp Sirohi

आओ भारत गढ़ें

आओ भारत गढ़ें, वीरों-वीरांगनाओं,
यह समय पुकार रहा है।
न खून की माँग आज,
पर श्रम, शपथ और चरित्र माँग रहा है।

तुम मुझे आलस दोगे-दोगी,
तो मैं तुम्हें पराधीनता दूँगा।
तुम मुझे ईमान दोगे-दोगी,
तो मैं तुम्हें स्वर्णिम भारत दूँगा।

यह युद्ध सीमा का नहीं है,
यह भीतर की रणभूमि है।
जहाँ भ्रष्टाचार सबसे बड़ा शत्रु,
अज्ञान और गंदगी ही दुश्मनी है।

ओ नवयुवक और नवयुवती!
उठो—
कलम को शस्त्र बनाओ,
ज्ञान को ढाल बनाओ।

जहाँ रिश्वत जड़ जमाए बैठी है,
वहाँ साहस से प्रश्न उठाओ।
जहाँ बेटियाँ शिक्षा से वंचित हैं,
वहाँ दीप बन स्वयं जल जाओ।

देश तुमसे भाषण नहीं माँगता,
न ही खोखले नारे चाहता है।
वह चाहता है—
तुम्हारा ईमान, तुम्हारा परिश्रम,
तुम्हारा जाग्रत विवेक।

हर युवा का योगदान चाहिए,
चाहे वह खेत में हो या विज्ञान में।
हर युवती की शक्ति चाहिए,
चाहे वह कक्षा में हो या संविधान में।

गंदगी केवल सड़कों पर नहीं,
वह सोच में भी बसती है।
अनपढ़ता केवल अक्षर की नहीं,
वह आत्मा को भी कचोटती है।

आओ—
इन्हें जड़ से मिटाएँ,
साफ़ मन, साफ़ तंत्र बनाएँ।
हर घर में शिक्षा,
हर कर्म में राष्ट्र बसाएँ।

यह भारत किसी एक का नहीं,
यह स्त्री-पुरुष दोनों की ज़िम्मेदारी है।
जब युवा जागता है,
तभी राष्ट्र की तैयारी है।

न पूछो देश क्या देगा,
यह प्रश्न अब छोटा पड़ गया।
पूछो—
तुमने देश के लिए
आज क्या किया,
यही उत्तर बड़ा बन गया।

आओ भारत गढ़ें,
स्वार्थ नहीं—स्वप्न लेकर।
स्वर्णिम भारत बनेगा
हर युवा, हर युवती के श्रम लेकर।

यह आह्वान है
हर भारत के वीर से,
और हर वीरांगना से—
आओ मिलकर लिखें इतिहास
नए युग की लकीर से।

— पुष्प सिरोही

आओ भारत गढ़ें
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
1. कविता का केंद्रीय भाव यह कविता देश-निर्माण के आह्वान पर आधारित है। इसका मूल संदेश है कि देशभक्ति केवल युद्धभूमि या वर्दी तक सीमित नहीं, बल्कि हर ईमानदार कर्म, हर जिम्मेदार नागरिक और हर जागरूक युवा-युवती के माध्यम से साकार होती है। 2. युवा और युवतियों की समान भूमिका कविता में नवयुवक और नवयुवती दोनों को समान रूप से संबोधित किया गया है। यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्र का निर्माण केवल पुरुषों का दायित्व नहीं, बल्कि स्त्री और पुरुष दोनों की समान जिम्मेदारी और शक्ति है। यह समावेशिता कविता को आधुनिक भारत की आत्मा से जोड़ती है। 3. देशभक्ति की परिभाषा इस कविता में देशभक्ति को नारे, भाषण या भावनात्मक उत्तेजना से ऊपर उठाकर ईमानदारी, शिक्षा, स्वच्छता, साहस और नैतिकता से जोड़ा गया है। कवि यह संदेश देता है कि जो भी कार्य भारत को आगे बढ़ाए — वही सच्ची देशभक्ति है। 4. सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष कविता भ्रष्टाचार, गंदगी और अशिक्षा को आधुनिक भारत के सबसे बड़े शत्रु के रूप में प्रस्तुत करती है। यह युद्ध बाहरी नहीं, बल्कि भीतर की रणभूमि है — जहाँ हर नागरिक को योद्धा बनना होगा। 5. ऐतिहासिक और ओजस्वी शैली कविता की शैली पुराने ओजस्वी राष्ट्रकाव्य (नेताजी, दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त परंपरा) की याद दिलाती है। "तुम मुझे दो—मैं तुम्हें दूँगा" जैसी पंक्तियाँ त्याग और प्रतिफल के गंभीर राष्ट्रवादी संवाद को सामने लाती हैं। 6. व्यक्तिगत से राष्ट्रीय यात्रा कविता में कवि स्वयं को केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागी के रूप में प्रस्तुत करता है। यह भाव आता है कि देश के लिए जीना केवल भावना नहीं, जीवन-पद्धति है। 7. कविता का उद्देश्य इस कविता का उद्देश्य है: युवाओं में कर्तव्यबोध जगाना देशभक्ति को व्यावहारिक कर्म से जोड़ना और एक स्वर्णिम, स्वच्छ, शिक्षित और ईमानदार भारत की कल्पना को साकार करना। समर्पण समर्पित: सिरोही परिवार को यह कविता सिरोही परिवार को समर्पित है — एक ऐसे परिवार को जिसने देशभक्ति को केवल शब्दों में नहीं, संस्कार, शिक्षा, सेवा और जिम्मेदारी में जिया है। यह समर्पण उन मूल्यों के लिए है जो पीढ़ियों से इस परिवार में प्रवाहित होते रहे हैं— जहाँ राष्ट्र पहले आता है, और स्वार्थ सबसे अंत में। — पुष्प सिरोही 🇮🇳
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