आओ भारत गढ़ें, वीरों-वीरांगनाओं,
यह समय पुकार रहा है।
न खून की माँग आज,
पर श्रम, शपथ और चरित्र माँग रहा है।
तुम मुझे आलस दोगे-दोगी,
तो मैं तुम्हें पराधीनता दूँगा।
तुम मुझे ईमान दोगे-दोगी,
तो मैं तुम्हें स्वर्णिम भारत दूँगा।
यह युद्ध सीमा का नहीं है,
यह भीतर की रणभूमि है।
जहाँ भ्रष्टाचार सबसे बड़ा शत्रु,
अज्ञान और गंदगी ही दुश्मनी है।
ओ नवयुवक और नवयुवती!
उठो—
कलम को शस्त्र बनाओ,
ज्ञान को ढाल बनाओ।
जहाँ रिश्वत जड़ जमाए बैठी है,
वहाँ साहस से प्रश्न उठाओ।
जहाँ बेटियाँ शिक्षा से वंचित हैं,
वहाँ दीप बन स्वयं जल जाओ।
देश तुमसे भाषण नहीं माँगता,
न ही खोखले नारे चाहता है।
वह चाहता है—
तुम्हारा ईमान, तुम्हारा परिश्रम,
तुम्हारा जाग्रत विवेक।
हर युवा का योगदान चाहिए,
चाहे वह खेत में हो या विज्ञान में।
हर युवती की शक्ति चाहिए,
चाहे वह कक्षा में हो या संविधान में।
गंदगी केवल सड़कों पर नहीं,
वह सोच में भी बसती है।
अनपढ़ता केवल अक्षर की नहीं,
वह आत्मा को भी कचोटती है।
आओ—
इन्हें जड़ से मिटाएँ,
साफ़ मन, साफ़ तंत्र बनाएँ।
हर घर में शिक्षा,
हर कर्म में राष्ट्र बसाएँ।
यह भारत किसी एक का नहीं,
यह स्त्री-पुरुष दोनों की ज़िम्मेदारी है।
जब युवा जागता है,
तभी राष्ट्र की तैयारी है।
न पूछो देश क्या देगा,
यह प्रश्न अब छोटा पड़ गया।
पूछो—
तुमने देश के लिए
आज क्या किया,
यही उत्तर बड़ा बन गया।
आओ भारत गढ़ें,
स्वार्थ नहीं—स्वप्न लेकर।
स्वर्णिम भारत बनेगा
हर युवा, हर युवती के श्रम लेकर।
यह आह्वान है
हर भारत के वीर से,
और हर वीरांगना से—
आओ मिलकर लिखें इतिहास
नए युग की लकीर से।
— पुष्प सिरोही
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