रात उतर आई थी धीरे-धीरे,
और बर्फ़ हवा में
चुपचाप घुल रही थी।
मैं रास्ते में था,
पर मन…
कहीं और जा रहा था।
एक जंगल था—
सफेद चादर ओढ़े,
वृक्ष ऐसे खड़े
जैसे मौन की सभा में
ध्यानमग्न साधु।
और बीच-बीच में
हवा की सांस
पत्तों पर
बहुत हल्का-सा
शोर कर देती।
मैं रुक गया।
कोई आवाज़ नहीं—
बस बर्फ़ का गिरना,
जैसे समय
अपने कदम
धीमे कर दे।
घोड़े की घंटी
(या मेरे भीतर की घड़ी)
एक बार बोली—
"चलना है।"
मैं मुस्कुरा दिया,
क्योंकि जंगल
मुझे रोक रहा था,
और दुनिया
मुझे बुला रही थी।
यहाँ सब कुछ
इतना सुंदर था
कि दुख भी
कुछ पल के लिए
शांत हो जाए।
इतना गहरा था
कि थकान भी
सुकून बन जाए।
बर्फ़ की महीन परत
मेरी पलकों तक आई,
और लगा—
जैसे जीवन ने
मेरे माथे पर
ठंडा-सा हाथ रखकर कहा,
"ठहर…
थोड़ा ठहर।"
पर मैं जानता था—
रास्ते बाकी हैं,
घर में दीये बाकी हैं,
लोगों की उम्मीदें
मेरे नाम से जुड़ी हैं।
इसलिए
मैंने उस जंगल को
आँखों में रख लिया,
उसकी शांति को
सीने में बाँध लिया,
और धीरे-धीरे
अपने कदम
फिर से उठा लिए।
जंगल पीछे रह गया—
पर उसका सन्नाटा
मेरे साथ चल पड़ा।
और रात के बीच
मैंने खुद से कहा—
"यह रुकना भी ज़रूरी था…
पर चलना भी।" -----------पुष्प सिरोही
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