शोर की रणनीति Poem by Pushp Sirohi

शोर की रणनीति

शहर कभी इतना शोर नहीं था,
गली कभी इतनी बेचैन नहीं थी।
फिर अचानक लाउडस्पीकर आए,
और सन्नाटे की कीमत बढ़ गई।

किसी ने माइक पर सपने बेचे,
किसी ने डर का बाज़ार लगाया।
सड़कें थकी हुई लगने लगीं,
और घर भी जैसे घबराने लगे।

फिर शहर के बाहर एक दरवाज़ा खुला —
ऊँची दीवारें, हरियाली, सुरक्षा के पहरे।
बोला गया —
"यहाँ शांति है, यहाँ सुकून है।"

पर किसी ने यह नहीं पूछा —
शोर आया कहाँ से था?

क्या यह बस शहर की किस्मत थी,
या किसी की चुपचाप रची हुई योजना?

पहले गलियों को बेचैन करो,
फिर दीवारों के भीतर स्वर्ग दिखाओ।

यही है उस दौर की कहानी
जहाँ सन्नाटा भी अब
एक महँगा उत्पाद बन चुका है।

और शहर…
धीरे-धीरे
अपने ही शोर से भाग रहा है।
जय हिंद
— पुष्प सिरोही

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