और वो जो तुम्हारे पास बैठा है… Poem by Pushp Sirohi

और वो जो तुम्हारे पास बैठा है…

वो जो तुम्हारे पास
इतना नज़दीक बैठा है—
मुझे लगता है
वो किसी देवता से कम नहीं,
क्योंकि वो
तुम्हारी हँसी
इतनी पास से सुनता है,
और तुम्हारी आवाज़
उसके कानों में
शहद की तरह उतरती है।

और मैं…
मैं दूर खड़ा होकर
बस देखता रह जाता हूँ।

तुम जब
हल्के से मुस्कुराती हो,
तो मेरा मन
अपनी जगह छोड़ देता है।

मेरी छाती में
कुछ टूटता भी नहीं,
फिर भी
सब बिखर जाता है।

मेरी ज़ुबान
जैसे अचानक
भूल जाती है
कि शब्द कैसे बने।

मैं बोलना चाहता हूँ…
पर आवाज़
कहीं अंदर ही
रुक जाती है।

जैसे
तुम्हारे सामने
मेरे भीतर का आदमी नहीं,
मेरे भीतर का डर
खड़ा हो जाता है।

मैं तुम्हें
बस एक पल देख लूँ,
और फिर
मेरी आँखों के आगे
अंधेरा-सा छा जाता है।

दिल
इतनी तेज़ धड़कता है
कि लगता है
किसी ने
मेरे सीने में
घंटियाँ बांध दी हैं।

मेरे कान
गूंजने लगते हैं—
और दुनिया की आवाज़ें
धीरे-धीरे
दूर चली जाती हैं।

बस तुम रहती हो…
और तुम्हारा होना
मेरे भीतर
आग की तरह फैलता है।

मैं काँप जाता हूँ।

मेरी त्वचा पर
पसीने की हल्की बूंदें
यूं उभर आती हैं
जैसे
शरीर भी
तुम्हारे प्रेम की भाषा
समझने लगा हो।

और एक अजीब-सी
ठंडक भी है
जो मुझे पकड़ लेती है—
जैसे मैं
अपने ही भीतर
डूब रहा हूँ।

क्या ये
ईर्ष्या है?
क्या ये
प्यार है?
या बस
तुम्हारी चमक का
एक असहाय असर?

क्योंकि
वो जो तुम्हारे पास बैठा है—
वो सिर्फ़
तुम्हारे शब्दों को नहीं,
तुम्हारे समय को
छू रहा है।

और मैं…
मैं एक किनारे खड़ा
अपने भीतर
टूटता हुआ देखता हूँ।

फिर भी
मैं तुमसे नाराज़ नहीं।

तुम्हारी चमक
तुम्हारा स्वभाव है,
और सूरज से
कोई शिकायत नहीं करता—
बस
छाँव में
अपना दिल
समेट लेता है।

लेकिन सच कहूँ?

अगर मेरी किस्मत में
सिर्फ़ इतना ही लिखा है
कि मैं तुम्हें
दूर से चाहूँ—

तो भी
मैं मान लूँगा।

क्योंकि
तुम्हें चाहना भी
मेरे लिए
कमाल की ज़िंदगी है।

और वो जो तुम्हारे पास बैठा है…
हाँ, वो खुशकिस्मत है।

पर वो ये नहीं जानता
कि तुम्हें दूर से देखना भी
किसी युद्ध से कम नहीं।
और मैं
हर दिन
वो युद्ध
चुपचाप लड़ता हूँ।

— पुष्प सिरोही

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