वो पहाड़ जो हम चढ़ते हैं Poem by Pushp Sirohi

वो पहाड़ जो हम चढ़ते हैं

हम कहाँ खड़े हैं?
एक ऐसे मोड़ पर
जहाँ हवा में
थकान की धूल है—
और फिर भी
आँखों में
कल का सूरज ज़िंदा है।

हमने टूटते हुए शहर देखे हैं,
दंगों की आग,
भूख की चीख,
और रिश्तों की दरारें—
हमने देखा है
कैसे उम्मीद
खून के बीच से भी
रास्ता बना लेती है।

हम पूछते हैं—
क्या आगे चलना सही है
जब पीछे इतना भारी है?
मैं कहता हूँ—
हाँ।
क्योंकि पीछे का दर्द
हमारी पहचान नहीं,
हमारी परीक्षा है।

हमने
कमज़ोरियों से
दीवारें नहीं बनानीं—
हमने
जिम्मेदारियों से
पुल बनाने हैं।

यह देश
सिर्फ़ नक्शा नहीं,
यह लोगों की धड़कन है—
यहाँ हर भाषा में
एक ही भावना है:
इंसान… इंसान रहे।

अगर अंधेरा
बहुत गहरा है,
तो याद रखो—
हम मशालें भी हैं।

हम गिरेंगे तो
धूल उठेगी—
पर वही धूल
कल की ईंट बनेगी।

हम रोएँगे तो
आँसू गिरेंगे—
पर वही आँसू
एक नए कल का
जल बनेंगे।

हमारे हाथों में
घाव हैं,
पर उन्हीं हाथों में
निर्माण भी है।

हमारे भीतर
डर है,
पर उसी डर के पीछे
हिम्मत छुपी है।

और हाँ—
कुछ लोग पूछेंगे:
"तुम्हें इतना विश्वास कहाँ से आता है? "
मैं कहूँगा:
हमने अपनी मिट्टी में
बहुत कुछ सहा है—
इसलिए
हमारी उम्मीद
कमज़ोर नहीं हो सकती।

चलो—
हम झगड़ों की भाषा
कम करें,
और साझेदारी की भाषा
बढ़ाएँ।

चलो—
हम जीत को
सिर्फ़ अपने नाम न लिखें,
हम उसे
सबके लिए
रोटी की तरह बाँटें।

क्योंकि
हमारे रास्ते अलग हो सकते हैं,
पर मंज़िल
एक ही है—
एक ऐसा कल
जहाँ कोई बच्चा
भूख से नहीं,
प्यार से बड़ा हो।

और सुनो—
ये पहाड़
हमसे बड़ा नहीं है।
क्योंकि
हम थक सकते हैं…
पर रुक नहीं सकते।

हम भाग्य से नहीं,
हौसले से चलते हैं।
हम डर से नहीं,
सपने से चलते हैं।

तो उठो—
अपने भीतर की रोशनी उठाओ,
अपने शहर की ज़िम्मेदारी उठाओ,
और उस पहाड़ की तरफ़ बढ़ो
जो हमें
हमारा बेहतर रूप
बनाता है।

हम चढ़ेंगे—
हाँ, हम चढ़ेंगे।
हम गिरेंगे—
तो उठेंगे।
हम थकेंगे—
तो सहेंगे।
हम हारेंगे—
तो सीखेंगे।

क्योंकि
हमारी कहानी
टूटने की नहीं—
जुड़ने की कहानी है।

और एक दिन
जब शिखर पर
धूप उतरेगी,
तो दुनिया देखेगी—
हमने
अंधेरे को
रोशनी में बदला है।

यही है वो पहाड़…
जो हम चढ़ते हैं।

-----पुष्प सिरोही

वो पहाड़ जो हम चढ़ते हैं
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