अग्नि-व्याघ्र Poem by Pushp Sirohi

अग्नि-व्याघ्र

अग्नि-व्याघ्र! अंधियारी रात में,
किसने गढ़ा ये तेज़ सितार?
आँखों में बिजली, साँसों में धुआँ—
किसके हाथों का है ये शृंगार?

किस भट्ठी में तेरा रंग ढला?
किस लावे से तेरा लहू बना?
कौन सा मंत्र तेरी नस में है,
जो डर भी तुझसे दूर खड़ा?

तेरे पंजे—जैसे वज्र की धार,
तेरी चाल—जैसे काल का सार,
तेरे माथे पर धधकता प्रश्न—
"मैं अंत हूँ… या आरंभ का द्वार? "

किस लोहार ने हथौड़ा उठाया,
किसने तुझमें आकाश जलाया?
किसने देखा तू बन रहा था
और फिर भी काँपा नहीं—मुस्कुराया?

क्या उसने भी तुझको ही चाहा,
जो फूलों में खुशबू भरता है?
जो चिड़िया की मीठी धुन रचता,
वही तुझमें आग उतरता है?

अग्नि-व्याघ्र! अंधियारी रात में,
तेरी लपटों की यह राज-भरी बात—
किसने रचा तुझे इतना भयानक,
और फिर भी तुझे कहा "सौगात"?

अग्नि-व्याघ्र! ओ तेज़ सितार,
तू शक्ति है… तू रहस्य अपार—
तेरे भीतर कौन-सा रचयिता,
जो डर के पार भी करता प्यार? ---पुष्प सिरोही

अग्नि-व्याघ्र
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