वे जो कभी पास थे Poem by Pushp Sirohi

वे जो कभी पास थे

जो कभी
मेरे कमरे की खामोशी में
बिना दस्तक के उतर आते थे,
आज वही
मेरे नाम से भी बचते हैं—
जैसे मेरा नाम
किसी पुराने अपराध की तरह हो।

कभी जिन कदमों की आहट
मेरे भीतर की दुनिया जगाती थी,
आज वही कदम
मुझसे दूर जाते हुए
अपने निशान तक छुपा लेते हैं।

अजीब है—
कल तक जो आँखें
मेरी आँखों में घर ढूँढती थीं,
आज वही आँखें
मुझे देखकर
रास्ता बदल लेती हैं।

और मैं सोचता हूँ—
क्या प्रेम
इतना कमज़ोर था?
या इंसान
इतना बदलने वाला?

कभी वे
मेरी हथेली पर
अपना भरोसा रख देते थे,
मेरी उंगलियों में
अपनी धड़कन बाँध देते थे।

आज
अगर मैं उसी हथेली को देखूँ,
तो बस एक सवाल मिलता है—
मैंने क्या माँगा था,
जो मेरा नहीं था?

हाँ—
मैं जानता हूँ,
जिन्हें हम "अपना" कहते हैं,
वे अक्सर
अपने होने की कीमत पर
किसी और के हो जाते हैं।

और फिर
हम पीछे रह जाते हैं—
अपनी ही यादों के बीच,
जहाँ एक समय
कोई हमारे बहुत करीब था।

मुझे याद है वो रात…
जब वो
शेरनी की तरह निडर थी,
और मेरे पास
हवा की तरह आई थी।

उसने मेरे कंधों पर
अपनी बाँह रखी थी,
और हँसकर कहा था—
"इतनी गंभीरता क्यों? "

फिर उसने
मेरे सीने के पास
अपना माथा टिकाया,
और मेरे भीतर
पूरा मौसम बदल गया।

उस रात
वो मेरी नहीं थी—
लेकिन उस पल
वो पूरी की पूरी
मेरे पास थी।

और पास होना—
कभी-कभी
किसी के "होने" से
ज्यादा बड़ा सच होता है।

फिर क्या हुआ?

फिर समय आया।
लोग आए।
दुनिया आई।
स्वार्थ आया।
मजबूरियाँ आईं।

और वो
जो कभी
मेरी उंगलियों में साँस लेती थी,
आज
मेरे नाम से डरती है।

मैं शिकायत नहीं करता…
बस हैरान हूँ।

क्योंकि
जो कल तक
नर्म हाथों से
मेरे दिल को छूता था,
आज वही हाथ
मुझे छूने से
ऐसे बचता है
जैसे मैं आग हूँ।

कभी-कभी
सबसे बड़ा दर्द
जुदाई नहीं होती—

दर्द ये होता है कि
जिसे हम जानते थे,
वो अब
हमारी याद में भी नहीं मिलता।

और फिर
मैं खुद से पूछता हूँ—

क्या प्रेम
बस एक दौर था?
क्या वो सिर्फ़
एक मौसम था?

अगर हाँ—
तो फिर वो रात
इतनी सच्ची क्यों थी?

मैं आज भी
उस स्पर्श को
झूठ नहीं कह सकता।
मैं आज भी
उस हँसी को
धोखा नहीं कह सकता।

पर मैं ये भी जानता हूँ—
अब वो
वापस नहीं आएगी।

क्योंकि
जो लोग
"भागना" सीख जाते हैं,
वे फिर
पास आने का साहस
कभी नहीं करते।

और जो लोग
"भूलने" की कला सीख जाते हैं,
वे फिर
किसी याद को
सम्मान नहीं देते।

लेकिन सुनो…

अगर कभी
रात के किसी कोने में
तुम्हें मेरी याद
छू ले…

तो भागना मत।

बस रुक जाना।
एक पल।

और खुद से कहना—
"हाँ…
कभी मैं भी
किसी के लिए
बहुत सच था।"

बस इतना ही।

मैं तुम्हें
दोष नहीं दूँगा।

मैं तो बस
इतना जानना चाहता हूँ—
कि जो लोग
कभी पास थे…

वे अब
क्यों भागते हैं?


पुष्प सिरोही

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