हॉर्न बजते रहे सड़कों पर,
शोर बढ़ता रहा रात-दिन,
पर किसे पता था
कि यही शोर बनेगा
किसी की आख़िरी धड़कन का गवाह?
गलियों में गूँजती आवाज़ें,
बाज़ारों में भागती भीड़,
और उन आवाज़ों के बीच
एक परिवार ने खो दिया
अपना सबसे प्यारा इंसान।
शूद्रों के हाथों में
जब हॉर्न आया,
तो रास्ते जागे—
पर कहीं किसी घर में
मौत का सन्नाटा भी छाया।
आवाज़ अधिकार हो सकती है,
पर आवाज़ हथियार नहीं।
सड़क सबकी है,
जीवन भी सबका है।
हॉर्न की आवाज़ से
किसी माँ की नींद न टूटे,
किसी बच्चे का बचपन न छूटे,
किसी परिवार की दुनिया न उजड़े।
**शोर कम हो सकता है,
पर खोई हुई ज़िंदगी
वापस नहीं आती।**
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