जो मुझसे भागते थे, आज मुझसे मिलने को तरसते हैं Poem by Pushp Sirohi

जो मुझसे भागते थे, आज मुझसे मिलने को तरसते हैं

जो कल तक
मेरे नाम से भी बचते थे,
आज वही
मेरे एक "हैलो" के लिए
दिन भर बेचैन रहते हैं।

जो मुझे
अपनी राह का पत्थर समझते थे,
आज मेरे बिना
अपनी मंज़िल अधूरी कहते हैं।

कभी जिन आँखों ने
मुझे देखकर
रास्ता बदल लिया था,
आज वही आँखें
भीड़ में मुझे
ढूँढ-ढूँढकर थक जाती हैं।

और मैं…
मैं अब वहीं नहीं हूँ
जहाँ तुमने मुझे छोड़ा था।

मैं आगे निकल आया हूँ—
इतना कि
तुम्हारी याद भी
अब मुझे पकड़ नहीं पाती।

कल तक
जिन्हें मेरे पास आने में
अपमान लगता था,
आज उन्हें
मेरे करीब न हो पाना
सज़ा लगता है।

कभी जो कहते थे—
"तुम्हारा होना ज़रूरी नहीं, "
आज वही
मेरी खामोशी से घबराते हैं।

मुझे याद है—
मैंने तुम्हें
अपने भीतर जगह दी थी,
तुम्हारी हर उलझन को
अपने सीने में सुलाया था।

पर तुमने
उस प्यार को
कमज़ोरी समझ लिया।

गलती तुम्हारी नहीं थी—
तुमने
शेर को
चुप रहते देखा था।

अब देखो…
मैं वही हूँ,
पर अब
मेरे अंदर का आदमी
जाग चुका है।

मेरी शांति अब
कमज़ोरी नहीं—
वर्चस्व है।

कभी तुम
मेरे हाथों में भरोसा रखकर
हँस दिया करते थे,
आज भी
हाथ आगे बढ़ाते हो,
पर दूरी रह जाती है।

क्योंकि
जिसे तुमने
कभी हल्के में लिया था,
उसने अब
खुद को भारी बना लिया है।

तुम्हें लगता है
मैं बदल गया हूँ?

नहीं।

मैं बस
उस जगह से निकल गया हूँ
जहाँ लोग
मेरे दिल से खेलते थे।

अब मेरे पास
मेरी क़ीमत है।

आज तुम
मेरे संदेश का इंतज़ार करते हो,
मेरे ऑनलाइन होने पर
दिल धड़कता है।

आज तुम्हारी रातें
मेरे नाम से जलती हैं,
और तुम्हारी नींद
मेरे ख्याल से टूटती है।

और सच बताऊँ—
ये बदला नहीं है।

ये बस
समय की अदालत है
जहाँ
हर किसी को
उसकी औक़ात का फैसला
मिलता है।

तुम्हें मेरी कमी
तब समझ आई
जब मैंने तुम्हें
अपनी ज़रूरत बनना छोड़ दिया।

तुम्हें मेरा महत्व
तब दिखा
जब मैंने
तुम्हें अपना केंद्र मानना छोड़ दिया।

अब तुम
पास आना चाहते हो…
तो आओ।

लेकिन
मैं वही नहीं
जो तुमने छोड़ा था।

अब मेरे पास
कमी नहीं—
चयन है।

और सुनो…

जो लोग
कभी मुझसे भागते थे,
आज मुझसे मिलने को तरसते हैं—

पर मैं…
मैं अब
भीड़ में भी
अकेला रहना सीख चुका हूँ।

क्योंकि
अब मुझे
किसी के आने से
पूरा नहीं होना।

मैं पहले ही
पूरा हूँ।

------पुष्प सिरोही

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