मैंने चाहा था कि
इश्क़ को इबादत बना दूँ,
और तुझे
अपनी रूह की सबसे
पाक किताब बना दूँ।
पर तुम मिली तो
मेरे शहर में
रातों ने चलना सीख लिया,
और दिन ने
हँसना छोड़ दिया।
तुम्हारी आँखों में
वो गहरी सियाही थी
जिसमें डूबकर
मैंने खुद को पहली बार
पहचाना—
कि आदमी
जब प्रेम करता है,
तो सिर्फ़ किसी को नहीं चाहता…
वो अपने भीतर
एक तख़्तापलट चाहता है।
मैंने तुम्हें
नर्म लफ़्ज़ों में नहीं चाहा,
मैंने तुम्हें
ज़ख़्मी हवाओं की तरह चाहा—
जो जिस्म को छूती हैं,
और रूह तक रह जाती हैं।
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने देखा—
मेरे अंदर की दुनिया में
बग़ावत शुरू हो गई है…
धड़कनें नाराज़ हैं,
नींदें कैद हैं,
और ख़ामोशी
हर रोज़ मुक़दमा लड़ती है।
मैं बहुत कोशिश करता हूँ
कि तुम्हें भूल जाऊँ…
पर भूलना भी तो
एक हुनर है,
और मेरा हुनर
सिर्फ़ तुम हो।
कभी-कभी सोचता हूँ—
ये मोहब्बत नहीं,
ये कोई क़ैद है…
जहाँ सज़ा भी तुम,
और रिहाई भी तुम।
फिर भी—
मैं तुम्हें बुरा नहीं कह सकता,
क्योंकि तुमने मुझे
टूटना नहीं सिखाया,
तुमने मुझे
ज़िंदा रहकर
जलना सिखाया।
और सुनो…
अगर ये इश्क़
अंजाम तक नहीं पहुँचता,
तो क्या हुआ?
कुछ ख्वाब
मुकम्मल होने के लिए नहीं—
ज़िंदा रखने के लिए होते हैं।
मैं आज भी
अपने ज़ख़्मों पर
तुम्हारा नाम रखता हूँ…
क्योंकि कुछ लोग
दर्द नहीं होते,
दुआ होते हैं।
और मैं—
तुम्हारे बाद भी
तुम्हारा हूँ…
जैसे पुष्प की किसी पंक्ति में
अधूरी सी उम्मीद।
— पुष्प सिरोही
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