कोयल
तेरी आवाज़ सुनकर
मेरे भीतर का बोझ
किसी पत्ते-सा हल्का हो जाता है।
जैसे दुख
संगीत के आगे
कुछ देर के लिए
हार मान लेता हो।
मैं थका हूँ—
दिन की धूप से,
लोगों के सवालों से,
अपनी ही सोच के शोर से…
और तू
काली रात में
एक ऐसी रोशनी है
जो दिखती नहीं,
पर महसूस होती है।
तेरा गीत
किसी शहद-सी हवा में
घुलता है—
और मेरे मन के घावों पर
धीरे से
मरहम रख देता है।
काश!
मैं भी उड़ पाता—
किसी मदिरा के नशे से नहीं,
किसी पलायन की कमजोरी से नहीं…
बस
कल्पना के पंखों पर।
मैं उड़ता—
इन गलियों से दूर
जहाँ हर चेहरा
थका हुआ भविष्य है,
जहाँ हँसी भी
औपचारिक लगती है,
और प्रेम भी
कभी-कभी
सौदे जैसा।
तू वहाँ गाती है
जहाँ न उम्र का डर है,
न कल का बोझ,
न "क्या होगा? " का काँटा—
बस
एक शुद्ध क्षण
जो अपनी मिठास में
अमर है।
मैं सोचता हूँ—
क्या तू भी जानती है
कि मनुष्य
कितना टूटता है?
कि आँखों में
आँसू जम जाते हैं,
और दिल
हँसते हुए भी
आह भरता है?
हमारे यहाँ
खुशियाँ भी
थक जाती हैं—
और समय
सब कुछ
छीनकर चला जाता है।
पर तेरा गीत—
तू जैसे
समय को भी
रोक देती है।
तेरी धुन में
ऐसा लगता है
जैसे दुनिया
एक पल के लिए
निर्दोष हो गई हो।
जैसे मृत्यु भी
शिष्ट बनकर
दूर खड़ी हो जाए।
उस पल
मैं चाहता हूँ
कि मैं भी
इसी संगीत में
खो जाऊँ—
इतना खो जाऊँ
कि मेरी थकान
नाम भूल जाए…
और मेरी पीड़ा
घर बदल ले।
पर फिर…
धुन दूर जाती है।
जैसे रात
धीरे-धीरे
किसी और जंगल में
सरक जाती है।
जैसे एक सपना
सुबह की रोशनी में
पीछे हट जाता है।
और मैं…
मैं वहीं रह जाता हूँ—
आधी मुस्कान,
आधा खालीपन,
आधा विश्वास।
कोयल!
क्या ये सच था?
या केवल
एक सुंदर भ्रम—
जो कुछ देर के लिए
मेरे भीतर
जीवित हो गया था?
तेरी आवाज़
अब भी हवा में है—
पर मैं
जाग रहा हूँ।
और मेरी आत्मा
अब भी पूछती है:
"क्या मैं लौटा हूँ…
या अभी तक
उसी गीत में
खोया हुआ हूँ? "
— पुष्प सिरोही
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