मेरे दोस्तों,
अगर मरना ही पड़े—
तो यूँ मत मरना
जैसे डर के पिंजरे में
कैद कोई जानवर मरता है।
अगर मरना ही पड़े—
तो यूँ मरना
कि मौत भी
एक पल रुककर कहे—
"ये इंसान
हारकर नहीं मरा।"
अगर दुनिया
हम पर टूट पड़े,
अगर नफरत
हमारी सांसों को घेर ले,
अगर कायरों की भीड़
हमारी गरिमा को
नोचने लगे—
तो भी
अपनी आत्मा को
झुकने मत देना।
हम गिने जा सकते हैं,
हम थकाए जा सकते हैं—
पर हम
तोड़ें नहीं जा सकते
अगर हमारे भीतर
सम्मान की आग
जलती रहे।
जब सामने
अंधेरा हो,
और पीछे
कोई रास्ता न बचे—
तब भी
हमारे हाथों में
हिम्मत रहे।
वो चाहते हैं
हम चुप रह जाएँ,
हम डर जाएँ,
हम घुटनों पर आ जाएँ—
पर हम
उनकी इच्छा नहीं,
अपनी पहचान हैं।
अगर घेरा डालें,
तो भी
हम छाती खोलकर खड़े हों—
कि हमारी नसों में
खून नहीं,
इंकलाब दौड़ता है।
हमारी हार
उनकी जीत नहीं बनेगी—
हमारी मौत
उनका जश्न नहीं बनेगी।
क्योंकि हम
अगर गिरेंगे भी,
तो
लड़ते हुए गिरेंगे।
और जब हम लड़ेंगे—
तो सिर्फ़ अपने लिए नहीं,
उन सब के लिए
जिन्हें डराकर
चुप कराया गया।
उन सब के लिए
जिनके सपनों पर
ताले लगाए गए।
तो मेरे दोस्तों,
अगर मरना ही पड़े—
तो मरना
शेरों की तरह।
कि हमारी आख़िरी सांस
भी एक आवाज़ बने—
और हमारी आवाज़ कहे—
"हम मिटे नहीं…
हम अमर हुए।"
क्योंकि
जीवन का मूल्य
लंबाई में नहीं—
गरिमा में होता है।
और अगर गरिमा बची रहे,
तो
मौत भी
झुककर सलाम करती है।
अगर मरना ही पड़े—
तो लड़ो।
और अगर लड़ना पड़े—
तो जीतो।
और अगर जीत भी न मिले—
तो कम से कम
इतना जरूर हो
कि दुनिया याद रखे—
हम हार मानने वालों में से नहीं थे।
— पुष्प सिरोही
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