मैं मुस्कुराता हूँ Poem by Pushp Sirohi

मैं मुस्कुराता हूँ

मैं नफ़रत नहीं करता—
मैं मुस्कुराता हूँ।

उन गधों पर…
जो उल्टा काम करके
खुद को बुद्धिमान समझते हैं।

मैं मुस्कुराता हूँ
उन लोगों पर
जो पीठ पीछे
शेर बनते हैं—
और सामने
"भाई-भाई" का
नाटक करते हैं।

मैं मुस्कुराता हूँ
उनकी "नीति" पर
जिनकी नीयत
गंदी होती है,
पर शब्दों में
पवित्रता टपकती है।

मैं मुस्कुराता हूँ
उनकी चालों पर—
जो मेरे खिलाफ
साजिश रचते हैं,
और फिर मेरी सफलता देखकर
"प्रेरणा" का पोस्ट डालते हैं।

मैं मुस्कुराता हूँ
उनके संस्कारों पर
जो अपमान करके
"मज़ाक" कह देते हैं।

उनकी रीढ़ पर
जो झूठ बोलते-बोलते
सीधी हो ही नहीं पाती।

मैं मुस्कुराता हूँ
उनकी सलाह पर
जो खुद डूबे हैं
और दूसरों को तैरना सिखाते हैं।

मैं मुस्कुराता हूँ
उनकी बड़ाई पर
जो खुद छोटे हैं
और आईने से
लड़ते रहते हैं।

मैं मुस्कुराता हूँ
क्योंकि मुझे पता है—
ये लोग
वो कीड़े हैं
जो रौशनी में नहीं,
बस
अँधेरे में पलते हैं।

और सच कहूँ—
मुझे गुस्सा आता है,
पर मैं उसे
हँसी बना देता हूँ।

क्योंकि
गुस्सा
मेरी ऊर्जा खाता है,
और मेरी हँसी
मेरी शक्ति बढ़ाती है।

मैं मुस्कुराता हूँ
जब वो मुझे गिराने आते हैं—
क्योंकि उन्हें पता नहीं
मैं गिरकर भी
सीढ़ी बना लेता हूँ।

मैं मुस्कुराता हूँ
जब वो मेरी चुप्पी को
कमज़ोरी समझते हैं—
क्योंकि उन्हें नहीं पता
चुप्पी भी
कभी-कभी
तूफान की माँ होती है।

मैं मुस्कुराता हूँ
उनकी जलन पर,
उनके झूठ पर,
उनकी घटिया बातों पर—

क्योंकि
मैं अब
उन जैसा नहीं बनता,
मैं बस
उनसे आगे निकल जाता हूँ।

और ये मुस्कान
मेरी मासूमियत नहीं—
ये मेरी
बेइज्ज़ती करने वालों के लिए
शालीन सज़ा है।

तो जब भी
कोई उल्टा काम करे,
मेरे नाम पर
घटिया खेल खेले—
मैं नफ़रत नहीं करता…

मैं बस
हल्की सी मुस्कान के साथ
इतना कहता हूँ—

"कर लो…
तुम गधे हो,
तुम्हारा काम ही यही है।"

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