अप्रैल आया…
पर फूल नहीं,
यादें उग आईं।
हवा में गीली मिट्टी की जगह
पुराने सवालों की गंध थी—
और हर नई कोंपल
दिल के भीतर
एक पुरानी चोट को
जगा रही थी।
मैं शहर के बीच चला—
लोग चलते थे,
पर उनकी आँखों में
चलना नहीं था।
भीड़ के कदम
एक ही ताल पर गिरते,
जैसे जीवन नहीं—
किसी मशीन का अभ्यास हो।
कहीं एक औरत
शीशों के महल में बैठी थी,
सोने की रोशनी में भी
उसका चेहरा बुझा था।
काँच की खुशबू,
मँहगे इत्र,
और भारी परदे—
पर भीतर
डर की सांस थी।
कहीं चाय की दुकान पर
हँसी बनकर
थकान गिर रही थी—
लोग बोलते थे,
पर शब्दों में
घर नहीं था।
बातों की चिड़िया
उड़ने से पहले ही
मर जाती थी।
नदी किनारे
पानी था…
पर पवित्रता नहीं।
कूड़े में फूल,
फूलों में धुआँ,
और धुएँ में
इंसान की इच्छाएँ—
जो जलती थीं
पर रोशनी नहीं देती थीं।
कामना का अग्नि-धर्म
हर चेहरे पर लिखा था—
स्पर्श था
पर अपनापन नहीं,
मिलन था
पर आत्मा अनुपस्थित।
प्रेम अब शब्द नहीं,
एक उपयोग बन गया था—
और शरीर
एक खाली कमरा।
मैंने देखा—
एक आदमी हँसा,
पर हँसी के पीछे
कोई रोया था।
मैंने देखा—
एक लड़की सजी,
पर उसके भीतर
खालीपन की धूल थी।
मैंने देखा—
कोई जीत रहा था,
पर उसकी जीत
किसी कब्र पर खड़ी थी।
फिर समुद्र आया—
नीला, गहरा,
और बेहद शांत।
एक नाम डूबा,
एक पहचान बह गई…
लहरों ने
उसका घमंड भी
और उसका परिचय भी
धो दिया।
पानी ने समझाया—
"जो तुम पकड़ते हो
वो तुम्हारा नहीं—
तुम्हें पकड़ता है।"
रात लंबी हुई।
रेत में शहर खड़ा था,
और शहर के भीतर
रेत भर रही थी।
हर खिड़की से
सूखी हवा आती,
हर कमरे में
प्यास का संगीत बजता।
और हम—
हम अपने ही जीवन में
परदेशी थे।
हम अपने ही दिल से
कटे हुए,
जैसे किसी किताब के पन्ने
बिना जिल्द के।
तभी—
बहुत दूर
बादलों के ऊपर
गरज उठी।
गरज ने कहा—
"दे।"
गरज ने कहा—
"दया।"
गरज ने कहा—
"दमन—अपने भीतर के तूफान का।"
मैं ठहरा।
मैंने अपनी मुट्ठी खोली—
और पहली बार
कुछ "छोड़ा।"
मैंने किसी की आँखों में
उतरकर
उसे "सुना।"
मैंने अपने भीतर
भूख की जगह
अनुशासन बैठाया।
और फिर—
अचानक
रेत के बीच
एक बूंद गिरी।
एक बूंद…
फिर दूसरी…
फिर तीसरी…
सूखी धरती ने
पहली बार
सांस ली।
मैंने जाना—
उजड़ापन बाहर नहीं,
भीतर बसता है।
और हर सूखा युग
अंत में
एक बारिश से नहीं—
एक बदलाव से टूटता है।
दूर कहीं
शांत स्वर गूंजा—
नदी की तरह,
प्रार्थना की तरह—
शांति… शांति… शांति…---पुष्प सिरोही
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