आओ—
आज हम आनंद नहीं,
मानवता चुनें,
और दिलों के बीच
खड़ी दीवारें
धीरे-धीरे बुनें नहीं—
गिराएँ।
आओ—
हँसी को फिर से
इंसान की भाषा बनाएं,
और हर टूटे चेहरे पर
उम्मीद की रोशनी
रख आएँ।
मानवता कोई नारा नहीं,
जो भीड़ में खो जाए—
मानवता वो हाथ है
जो गिरते हुए को
बिना पूछे
थाम जाए।
जहाँ नफ़रत
लोहे की ज़ंजीर बनाती है,
मानवता
खामोशी से
पुल बन जाती है—
और अजनबी दिलों को
एक-दूसरे का
घर बना देती है।
आओ—
बाँट लें
अपने हिस्से की धूप,
क्योंकि ख़ुशियाँ
बड़ी होती हैं
जब वे साझा हों।
जो रोया है—
उसे गले लगाओ,
जो हारा है—
उसकी आँखों में
फिर से
सपना जगाओ।
क्योंकि इंसान की
सबसे बड़ी पूजा
किसी मूर्ति में नहीं—
एक दूसरे इंसान में है।
देखो—
एक ही आसमान है,
एक ही धरती,
एक ही हवा,
फिर ये "मैं" और "तू"
किस बात का घमंड?
हम सब
एक ही यात्रा के
मुसाफ़िर हैं—
किसी की राह कठिन,
किसी की राह सरल,
पर मंज़िल—
मानवता।
जब दिल
दूसरे दिल का दर्द समझे,
जब आँख
दूसरे की आँख में
आँसू पढ़ ले—
तभी सच्चा आनंद
धरती पर उतरता है।
तो आओ—
नफ़रत का शोर
कम कर दें,
और प्रेम की भाषा में
दुनिया को
फिर से
मानव कर दें।
हँसो—
पर किसी को तोड़कर नहीं,
जीतो—
पर किसी को रौंदकर नहीं,
बढ़ो—
पर किसी को छोड़कर नहीं।
आज यही
हमारा धर्म हो,
यही हमारा स्वर हो,
यही हमारा
मानवता का मंत्र हो—
"हम एक हैं…
और यही हमारा सत्य है।"
— पुष्प सिरोही
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