दोस्त,
मैं तुम्हें
बड़े-बड़े शब्दों में नहीं चाहता—
मैं तुम्हें
दिन की सादगी में चाहता हूँ।
मैं तुम्हें
किसी महल के शीशों में नहीं,
मैं तुम्हें
गली के उस कोने में चाहता हूँ
जहाँ धूप
दीवारों पर बैठकर
थोड़ी देर सुस्ता लेती है।
दोस्त,
जब तुम हँसती हो
तो हवा
अपने आप मीठी हो जाती है।
तुम्हारी हँसी
ऐसी है
जैसे किसी थके दिल ने
अचानक
जीना सीख लिया हो।
मैं तुम्हें
गुलाब का गुलाम बनाकर नहीं,
मैं तुम्हें
अपनी बराबरी बनाकर चाहता हूँ।
मैं चाहता हूँ
तुम मेरी बाँह में नहीं—
मेरे साथ चलो।
मेरे कदमों के साथ
अपने कदम रखो,
और फिर
दुनिया को बताओ—
प्यार
किसी का मालिक बनना नहीं,
प्यार
किसी को
घर देना है।
दोस्त,
कभी-कभी
रात बहुत लंबी होती है,
और मेरे पास
तुम्हारे नाम के सिवा
कुछ नहीं बचता।
मैं तुम्हारा नाम
ऐसे बोलता हूँ
जैसे थका आदमी
पानी का नाम ले।
और सच कहूँ—
तुम्हारा नाम
मेरे लिए
पानी ही है।
तुम्हारे बिना
मैं ठीक हूँ—
ऐसा नहीं है।
पर तुम्हारे बिना
मैं टूटता नहीं—
ये भी सच है।
क्योंकि तुमने
मुझे सिखाया है
कि प्रेम
कमजोरी नहीं होता—
प्रेम
हिम्मत होता है।
दोस्त,
अगर दुनिया
तुम्हारे खिलाफ़ हो जाए,
तो भी
मैं तुम्हारे साथ
खड़ा रहूँगा।
क्योंकि मेरा प्यार
वक्त का नौकर नहीं,
मेरी रूह का फैसला है।
मैं तुम्हें
किसी गीत की तरह नहीं,
मैं तुम्हें
अपनी सांस की तरह चाहता हूँ।
सांस
हर रोज़ चलती है,
बिना शोर के,
बिना दिखावे के,
बस
जिंदा रखने के लिए।
और दोस्त…
अगर तुम पूछो
कि मैं तुम्हें
कितना चाहता हूँ—
तो मैं कहूँगा
इतना,
कि तुम्हारे दुख का एक कण
भी मेरे पास आ जाए
तो मेरी आँखें
नम हो जाएँ।
और तुम्हारी खुशी की
हल्की सी परछाईं भी
मेरे चेहरे पर
पूरा सूरज खिला दे।
मैं तुम्हें
सोना-चाँदी नहीं दूँगा,
मैं तुम्हें
हर दिन
एक सच्चा आदमी दूँगा—
जो तुम्हारे सामने
अपने नकाब नहीं बदलता।
मैं तुम्हें
वही दूँगा
जो सबसे मुश्किल है—
वफ़ा।
दोस्त,
यह प्रेमगीत
कोई मंच नहीं चाहता।
इसे तालियों की जरूरत नहीं।
बस
तुम्हारे कानों तक पहुँचे,
और तुम्हारे दिल में
धीरे से बैठ जाए—
यही काफी है।
क्योंकि
जब तुम सुनती हो,
तो मेरी आवाज़
सच हो जाती है।
और जब तुम मुस्कुराती हो,
तो मेरा जीवन
गीत हो जाता है।
----पुष्प सिरोही
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