रेत में सिंहासन Poem by Pushp Sirohi

रेत में सिंहासन

मैंने एक मुसाफ़िर से सुना—
रेगिस्तान के बीच
एक टूटा हुआ अजूबा पड़ा है।
दो विशाल पाँव—
बिना शरीर के,
खामोशी में खड़े…
जैसे समय
अपने ही मज़ाक पर
हँस रहा हो।

पास ही
चेहरे का आधा हिस्सा—
पत्थर में कैद
अहंकार की लकीरें,
भौंहों में कठोरता,
होठों पर
हुक्म का जहर…
किसी पुराने राजा की
जमी हुई गरज।

कितना अजीब है—
एक कलाकार की उँगलियों ने
उस घमंड को भी पढ़ लिया था,
जो राजा खुद
छुपा नहीं सका।
पत्थर ने
राजा की शक्ति नहीं,
उसकी घमंड भरी आत्मा
उकेर दी।

और उस मलबे के पास
एक शिलालेख था—
जिस पर लिखा था
(हवा की धूल में डूबा हुआ) :
"देखो मेरी महानता!
मैं राजाओं का राजा हूँ!
मेरे कामों से काँपो! "

मैंने चारों तरफ देखा—
काँपने वाला
कोई नहीं था।
बस
एक लंबा सन्नाटा,
और रेत की अनगिनत लहरें…
जो बताती थीं—
"यहाँ कभी
महल रहे होंगे।"

जहाँ सेनाएँ चलती होंगी,
वहाँ अब
केवल हवा चलती है।
जहाँ आदेश गिरते होंगे,
वहाँ अब
धूप गिरती है।
जहाँ मुकुट चमकता होगा,
वहाँ अब
कांटेदार झाड़ियाँ
अपनी परछाईं गिनती हैं।

तब मुझे समझ आया—
सत्ता बहुत बड़ी लगती है,
पर समय
उससे भी बड़ा है।
और घमंड
सबसे तेज़ भाषा है—
जिसे अंत में
मिट्टी ही
चुप करा देती है।

जो खुद को
अनंत समझ बैठे—
उसकी निशानी
कभी-कभी
बस एक टूटा पत्थर होती है,
और एक व्यंग्य-सा वाक्य
जो रेगिस्तान
हर दिन दोहराता है।

"देखो…"
"देखो…"
"यह था राजा…"

और फिर
हवा हँस देती है।

— पुष्प सिरोही

रेत में सिंहासन
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