झूठा गौरव Poem by Pushp Sirohi

झूठा गौरव

मेरे दोस्तों,
जंग
पोस्टर पर सुंदर लगती है।
भाषण में महान लगती है।
और नारों में
गर्व बनकर चमकती है।

पर असल जंग…
असल जंग
वो नहीं जो दुनिया सुनाती है—
असल जंग
वो है जो
आँखों की पुतलियों में
हमेशा के लिए रह जाती है।

हम चल रहे थे—
थके हुए,
टूटे हुए,
कंधों पर बोझ,
पैरों में छाले,
और आँखों में
नींद नहीं…
धुआँ था।

हम जवान थे,
पर हमारी चाल
बूढ़ों जैसी थी।

फिर अचानक
हवा चीखी—

"वायरस! वायरस! "

और वही पल
ज़िंदगी को
सिर्फ़ सांस बना देता है।

हाथ काँपे,
मास्क ढूँढे गए,
किसी ने बाँधा,
किसी ने खो दिया।

एक आदमी
पीछे रह गया।

मैंने देखा—
वो भागना चाहता था,
पर हवा
उसके फेफड़ों में
ज़हर बनकर उतर चुकी थी।

वो गिरा—
जैसे कोई तारा
जमीन पर टूटकर गिरता है।

उसकी आँखें
मेरे सामने थीं—
और उन आँखों में
मदद नहीं…
मौत थी।

वो मेरे सपनों में
आज भी आता है।

उस घड़ी में
वो तड़पता है—
और मैं
कुछ नहीं कर पाता।

उसके गले की आवाज़
अब भी
मेरे कानों में
जंग की तरह बजती है।

और फिर
लोग कहते हैं—
"युद्ध गौरव है।"
"देश के लिए मरना
सबसे मीठा सम्मान है।"

मैं हँसता नहीं,
मैं चुप हो जाता हूँ।

क्योंकि जो ये कहते हैं—
उन्होंने
कभी वो चेहरा नहीं देखा
जो अपनी सांसों से
लड़ रहा होता है।

अगर तुम
देख पाते
वो शरीर
जो मिट्टी में घिसटता है,
वो खून
जो मिट्टी में मिल जाता है,
वो माँ
जिसे बस
एक झंडा दिया जाता है—

तो तुम
कभी ये झूठ
दोबारा नहीं कहते।

युद्ध
किसी गीत का मुखड़ा नहीं,
युद्ध
किसी फिल्म की जीत नहीं,
युद्ध
एक लंबा शोक है—
जिसमें
मिट्टी
कई नाम निगलती है।

तो मेरे दोस्तों,
जो लोग कहते हैं
"युद्ध महान है"
उन्हें एक बार
उस रात में भेजो
जहाँ आदमी
सिर्फ़ सांस बनने को मजबूर होता है।

और तब पूछो—

क्या सच में
युद्ध
गौरव है?

या फिर
ये भी
एक सुंदर झूठ है
जिससे
श्मशान घाट और कब्रें भरती हैं?

— पुष्प सिरोही

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