खुशी का छोटा सा विचार Poem by Pushp Sirohi

खुशी का छोटा सा विचार

सुबह की नर्म धूप में,
मैं चुपचाप पेड़ तले बैठा था,
हवा के हल्के-हल्के गीतों में
जैसे समय भी ठहरा था।

ऊपर शाखों के बीच कहीं
एक चिड़िया गा रही थी,
अपने छोटे-से घोंसले को
जैसे दुआ बना रही थी।

उसकी आवाज़ में कोई चिंता नहीं,
ना कल का डर, ना दूरी थी,
बस आज की मीठी साँसें थीं—
और अपनेपन की पूरी थी।

मैंने देखा—
घोंसला था छोटा,
पर सुकून था बड़ा,
काँटों में भी उसने
अपना घर गढ़ा।

उसने बच्चों को पंख सिखाए,
और आसमान का भरोसा दिया,
एक तिनके में भी
जीवन का मतलब रख दिया।

मैंने सोचा—
अगर एक नन्ही-सी चिड़िया
इतनी खुशी से रह सकती है,
तो मेरी रूह क्यों हर रोज़
बेवजह थक सकती है?

खुशी कोई महल नहीं,
खुशी कोई शोर नहीं,
खुशी तो वो पल है
जहाँ दिल कह दे—
'मुझे और कुछ नहीं चाहिए।'

उस चिड़िया की धुन ने
मुझे बस इतना सिखाया—
जो आज है, वही अनमोल है,
जो पास है, वही खुदा है।

और मैं…
पेड़ के नीचे
थोड़ा और मुस्कुराया,
क्योंकि मुझे
खुशी का रास्ता
आज पहली बार
इतना सरल नज़र आया।— पुष्प सिरोही

खुशी का छोटा सा विचार
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