वक़्त राहत नहीं लाता - तुम सबने झूठ कहा Poem by Pushp Sirohi

वक़्त राहत नहीं लाता - तुम सबने झूठ कहा

वक़्त राहत नहीं लाता—
तुम सबने झूठ कहा था।
तुमने कहा था
कि दिन बीतेंगे,
तो दर्द भी थक जाएगा।
तुमने कहा था
कि मौसम बदलेंगे,
तो यादें भी रंग बदल लेंगी।

पर नहीं।

आज भी वही चोट
उसी जगह
उसी तीखेपन से जलती है—
जैसे समय
मरहम नहीं,
बस एक लंबा गलियारा हो
जहाँ दर्द
चलता चला जाता है
और मेरा मन
हर मोड़ पर
तुम्हारे नाम से टकरा जाता है।

मैंने महीनों को
गिन-गिनकर देखा,
सालों को
चुपचाप गुज़रते देखा—
पर हर बार
जब दिल ने पूछा,
"अब तो ठीक हो जाओगे? "
तो भीतर से
एक ही आवाज़ आई—
नहीं।

वक़्त ने
कुछ नहीं छीना।
वक़्त ने
कुछ नहीं बदला।
वक़्त ने
बस मेरी आँखों के नीचे
थकान की लकीरें बढ़ा दीं
और मेरे शब्दों में
खामोशी घोल दी।

तुम कहते थे
"दूरी से सब मिट जाता है।"
मैंने दूरी बना ली।
तुम कहते थे
"नया शहर नई हवा दे देगा।"
मैंने शहर बदल लिया।
तुम कहते थे
"काम में खो जाओ।"
मैंने खुद को
काम में दफना दिया।

लेकिन सच ये है—
जहाँ भी गया,
तुम
मेरे साथ चले आए।

तुम
मेरे कमरे के पंखे में
एक उदास आवाज़ बनकर,
मेरी खिड़की के बाहर
बारिश की बूंदों में,
और मेरे फोन की स्क्रीन पर
अधूरे संदेशों की तरह—
हर जगह
बस तुम्हारा नाम
छूकर गुज़रता रहा।

मैंने खुद को समझाया—
कि ये बस
आदत है,
कि ये बस
याद है,
कि ये बस
एक दौर था।

पर ये दौर नहीं था।
ये तो
मेरे भीतर की
एक स्थायी आग थी—
जो दिखती नहीं,
पर हर साँस में
धुआँ छोड़ती है।

कभी-कभी
मैं बाहर से
बहुत सामान्य दिखता हूँ—
हँसता हूँ,
बात करता हूँ,
लोगों के बीच
ठीक लगता हूँ।

लेकिन अंदर…
अंदर मैं
एक अकेला आदमी हूँ,
जो रोज़
अपने ही दिल की अदालत में
गवाही देता है—

कि प्रेम
सिर्फ़ सुंदर शब्द नहीं होता।
प्रेम
कभी-कभी
एक सज़ा होता है।

और सबसे अजीब बात—
दर्द भी
एक तरह का वफ़ादार जानवर है।
वो चला नहीं जाता।
वो बस
बैठ जाता है
मेरे पास—
शांत, भारी,
और लंबे समय तक।

कभी मैं सोचता हूँ—
क्या मैं
तुम्हें सच में भूलना चाहता हूँ?

क्योंकि
भूल जाना
एक तरह की मौत है—
और मैं
तुम्हें मार नहीं सकता।

तुम
मेरी स्मृतियों में नहीं,
मेरी नसों में हो।
और जो चीज़
रक्त में उतर जाए—
उसे समय
निकाल नहीं सकता।

आज भी
किसी शाम
अगर वही खुशबू आ जाए,
या वही गीत बज जाए,
तो मैं
उसी पुराने दिन में
वापस गिर जाता हूँ—

और वहाँ
तुम होती हो,
वैसी ही
जैसी तुम थी—
और मैं
वैसा ही
जैसा मैं था—
टूटा नहीं था,
संदेह नहीं था,
बस
इश्क़ था।

तो अब मैं
तुम्हारी बातों पर
हँसता हूँ—
उन लोगों की बातों पर भी
जो कहते हैं,
"वक़्त सब ठीक कर देता है।"

नहीं।

कुछ घाव
ठीक नहीं होते।
कुछ प्यार
समाप्त नहीं होते।

कुछ लोग
मिलकर भी
हमेशा के लिए
हमसे दूर हो जाते हैं।

और कुछ यादें
मरकर भी
मरती नहीं।

वक़्त राहत नहीं लाता—
तुम सबने झूठ कहा।

मैं आज भी
उस प्यार के पास खड़ा हूँ,
जहाँ तुमने
मेरा हाथ छोड़ा था—
और मेरा दिल
अब तक
वहीं ठहरा है।

— पुष्प सिरोही

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