विश्वासघाती मित्र Poem by Pushp Sirohi

विश्वासघाती मित्र

विश्वासघाती मित्र—
वह नहीं, जो खुलकर विरोध करे,
वह तो वह है
जो गले लगते-लगते
पीठ में खंजर उतार दे।

वह हँसते हुए
हमारे राज़ सुनता है,
और फिर
दुश्मन की चौखट पर
उसी मित्रता को
ख़बर बनाकर बेच आता है।

उसके शब्दों में अपनापन,
पर इरादों में स्वार्थ,
उसकी आँखों में मुस्कान,
पर हृदय में केवल व्यापार।

ऐसा मित्र
मित्र नहीं होता—
वह तो
विश्वास का अपराधी है,
जो रिश्तों का रक्त
धीरे-धीरे बहा देता है।

जिसके पास
ईमानदारी नहीं,
उसके पास
मित्रता का अधिकार भी नहीं।

क्योंकि जो मित्र
मित्रता को दुश्मन के हाथ
सूचना बनाकर सौंप दे—
उसके माथे पर "शर्म" नहीं,
उसकी आत्मा पर "धब्बा" लिखा होता है।

ऐसे लोग मित्र नहीं होते—
वे सिर्फ़ नाम के साथी होते हैं,
और इतिहास में
गिरवी रखी हुई ईमानदारी
के रूप में याद किए जाते हैं।

और मैं गर्व से कहता हूँ—
हज़ार मूर्खों की भीड़ से बेहतर है
अकेले रहना,
क्योंकि अकेलापन
कम से कम
धोखा नहीं देता।

— पुष्प सिरोही

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