मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ? Poem by Pushp Sirohi

मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ?

मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ—
क्या मैं गिन सकता हूँ इसे?
चलो—
मैं तुम्हें बताता हूँ
अपने दिल की हर दिशा से।

मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
उन ऊँचाइयों तक
जहाँ सोच भी
बस मौन हो जाती है—
जहाँ आत्मा
ईश्वर के करीब
साँस लेती है।

मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
उन गहराइयों तक
जहाँ मेरी थकान
नींद बनकर उतरती है,
जहाँ मेरी पीड़ा
अपने नाम बदल देती है।

मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
हर साधारण दिन की तरह—
रोटी की खुशबू,
घर की शांति,
और शाम की धीमी रोशनी…
जैसे ये सब
तुम्हारे बिना
अधूरे हों।

मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
निस्वार्थ,
जैसे कोई दिया
रोशनी देकर
कुछ माँगता नहीं।

मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
उस विश्वास की तरह
जो बिना शोर
हर तूफान में
टिका रहता है।

मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
हँसी में भी,
और आँसू में भी—
क्योंकि तुम
मेरी ख़ुशी नहीं,
मेरी ज़रूरत बन गई हो।

मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
वैसे भी
जैसे कभी
मैंने अपने भीतर
सच को चाहा था—
बिना लाभ के,
बिना शर्त के।

और मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
उसी साँस की तरह
जो चलते-चलते
रुकती नहीं—
बस
चलती रहती है…
जब तक जीवन है।

और अगर ईश्वर ने
फिर से जन्म दिया,
तो भी—
मैं उसी तरह
तुम्हें चाहूँगा,
क्योंकि
मेरा प्रेम
समय का मोहताज नहीं—
यह तो
मेरी आत्मा की आदत है।

— पुष्प सिरोही

मैं तुमसे कितना प्रेम करता हूँ?
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