भारतीय पक्षियों की सभा Poem by Pushp Sirohi

भारतीय पक्षियों की सभा

एक सुबह
पीपल की सबसे ऊँची डाल पर
पंछियों की सभा लगी—
जैसे आकाश ने
अपनी संसद बुला ली हो।

कौआ बोला—
"बहुत देखा ये शहर,
कूड़े के ढेर, खाली छतें…
हमारा राजा कौन है? "

कबूतर ने पंख फड़फड़ाए—
"हम उड़ते हैं,
फिर भी डरते हैं…
हमें कोई राह दिखाने वाला चाहिए।"

तोते ने कहा—
"मैं शब्द जानता हूँ,
पर अर्थ कहाँ है?
मैं बोलता बहुत हूँ,
पर भीतर
खामोशी का सूखा है।"

कोयल मुस्कुराई—
"सुर तो है…
पर दिल में
एक अधूरी पुकार है।"

मोर ने पंख फैलाए—
"रंग मेरे पास हैं,
पर शांति नहीं,
इज्ज़त के ताज में भी
भूख छिपी रहती है।"

उल्लू ने धीमे से कहा—
"अँधेरा गलत नहीं—
गलत है
अपने भीतर का अँधेरा
समझे बिना जीना।"

तभी—
एक हंस आया,
माथे पर ज्ञान का तिलक,
आँखों में जंगल की धूप,
और आवाज़ में
पुरानी ऋषियों-सी गंभीरता।

उसने कहा—
"तुम जिस राजा को ढूँढ रहे हो,
वो बाहर नहीं—
भीतर है।
पर उसे पाने को
तुम्हें सात वन पार करने होंगे।"

सभा में सन्नाटा गिरा—
फिर बाज बोला—
"सात वन?
हम तो आकाश के राजा हैं! "
हंस मुस्कुराया—
"आकाश जीत लेना आसान है,
अपने अहं को जीतना कठिन।"

पहला वन: तलाश का वन

सब चले—
बया भी चली
अपने घोंसले के सपनों से,
मैना भी चली
किस्सों की झिलमिल से,
और नीलकंठ भी
नीले धैर्य के साथ।

कई पंछी लौट गए—
क्योंकि तलाश में
धैर्य लगता है,
और धैर्य
हर पंख में नहीं होता।

दूसरा वन: इश्क़ का वन

यहाँ प्रेम
रस नहीं—
आग था।
कोयल गाती रही,
पर स्वर काँपता रहा।
मोर की आंखें झुकीं—
क्योंकि इश्क़
सिर्फ़ नाच नहीं,
समर्पण था।

तीसरा वन: ज्ञान का वन

उल्लू ने कहा—
"जो जान लेते हैं
वो खो जाते हैं।"
तोते की बोली
कम होने लगी—
क्योंकि भीतर का सच
शब्दों से बड़ा था।

चौथा वन: वैराग्य का वन

कबूतर ने
अपनी आदतें छोड़ीं,
कौए ने
अपनी शिकायतें,
और गिद्ध ने
अपना क्रोध।
क्योंकि राजा तक
भार नहीं जाता—
सिर्फ़
हल्की आत्मा जाती है।

पाँचवां वन: एकता का वन

अब पक्षी
पक्षी नहीं रहे—
वे एक लय बन गए।
"मैं" और "तू"
उड़ान से गिर गए,
और "हम"
आकाश की भाषा बन गया।

छठा वन: विस्मय का वन

यहाँ हर पेड़
पूछता था—
"तुम कौन हो? "
और हर पत्ता
कहता था—
"जो तुम ढूँढ रहे हो
वो तुम ही हो।"

सातवां वन: अहं-समाप्ति का वन

यहाँ
सिर्फ़ मौन था।
धड़कन भी धीमी,
हवा भी नम।
और भीतर से
एक आवाज़ आई—
"अब कुछ मांगो मत…
बस मिट जाओ।"

अंत में
बस कुछ पक्षी बचे—
थके हुए,
पर उजले।

वे एक झील के पास पहुँचे—
जहाँ पानी
आईने-सा साफ़ था।

उन्होंने राजा को देखा…
और काँप उठे—
क्योंकि राजा
कोई अलग चेहरा नहीं था।

वो उनका ही प्रतिबिंब था।
उनकी ही आँखें…
उनकी ही उड़ान…
उनकी ही खोज।

हंस बोला—
"तुम जो ढूँढ रहे थे,
वो ताज नहीं था…
वो जागरण था।"

तभी
कोयल ने
सबसे धीमी धुन में कहा—
"राजा मिल गया…"

और मोर ने
पंख नहीं फैलाए—
सिर्फ़ सिर झुका लिया।

कौआ बोला—
"तो मतलब
हमारा राजा…"

उल्लू ने पूरा किया—
"हमारे भीतर ही था।"

और आकाश ने
फिर से
एक नई उड़ान
लिख दी।

— पुष्प सिरोही

भारतीय पक्षियों की सभा
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