युवा भारत Poem by Pushp Sirohi

युवा भारत

युवा भारत ऐसा हो
जो भीड़ नहीं, तूफ़ान बने।
जो अन्याय देखे तो चुप न रहे,
बल्कि व्यवस्था की नींव हिलाने का कारण बने।

युवा भारत ऐसा हो
जिसकी आँखों में डर नहीं,
और जुबान पर सच हो—
चाहे सामने कोई भी हो।

युवा भारत ऐसा हो
जो कुर्सी से नहीं,
कर्म से सत्ता बदले।
जो भ्रष्ट तंत्र को
सीधे उसकी जड़ों से उखाड़ फेंके।

युवा भारत ऐसा हो
जो धर्म को हथियार नहीं,
चरित्र बनाए।
जो नफरत नहीं,
राष्ट्र के लिए आग बनाए।

युवा भारत ऐसा हो
जो गंदगी को कोसे नहीं,
खुद उसे जलाकर राख कर दे।
जो अशिक्षा पर भाषण न दे,
बल्कि ज्ञान से उस पर प्रहार कर दे।

युवा भारत ऐसा हो
जिसे रिश्वत घिनौनी लगे,
और ईमानदारी गर्व लगे।
जो भूखा रह ले
पर देश को बेचकर अमीर न बने।

युवा भारत ऐसा हो
जहाँ बेटा-बेटी भेद नहीं,
दोनों रुद्र की शक्ति हों।
जहाँ नारी सम्मान नहीं माँगे,
वह स्वयं न्याय की मूर्ति हो।

युवा भारत ऐसा हो
जो वर्दी को पूजा माने,
पर बिना वर्दी भी
राष्ट्र के लिए जान लगाए।

युवा भारत ऐसा हो
जो कहे नहीं— "कोई और करेगा",
बल्कि दहाड़ कर कहे—
"अगर नहीं किया गया,
तो मैं करूँगा।"

युवा भारत ऐसा हो
जो सोशल मीडिया का योद्धा नहीं,
जमीनी क्रांति का अग्रदूत बने।
जो पोस्ट नहीं,
इतिहास लिखे।

युवा भारत ऐसा हो
जो टूटे भारत को जोड़ दे,
और सड़े सिस्टम को तोड़ दे।
जो समझौता नहीं,
परिवर्तन लेकर चले।

यही युवा भारत चाहिए—
शांत नहीं,
रुद्र।

— पुष्प सिरोही 🇮🇳

युवा भारत
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
कविता: "युवा भारत: रुद्र स्वर" — व्याख्यात्मक नोट यह कविता युवा भारत की चेतना का स्वर है। यह केवल एक रचना नहीं, बल्कि आह्वान, चेतावनी और संकल्प है। कविता में "रुद्र" शब्द उस युवा शक्ति का प्रतीक है जो अन्याय के सामने मौन नहीं रहती, जो व्यवस्था से टकराने का साहस रखती है, और जो राष्ट्रनिर्माण को भावनात्मक नहीं, कर्तव्यात्मक रूप में देखती है। इस कविता का मूल संदेश है कि युवा भारत भीड़ नहीं बने, बल्कि तूफ़ान बने, देशभक्ति नारे नहीं, चरित्र में दिखाई दे, और परिवर्तन सोशल मीडिया पर नहीं, जमीनी कर्म में उतरे। कविता यह स्पष्ट करती है कि देश के शत्रु केवल सीमाओं पर नहीं होते— भ्रष्टाचार, अशिक्षा, गंदगी और डर भी उतने ही बड़े शत्रु हैं। यह रचना युवक और युवती—दोनों को समान रूप से राष्ट्रनिर्माण का उत्तरदायित्व सौंपती है। यह कहती है कि जो भी भारत को आगे बढ़ाए, वही सच्चा राष्ट्रसेवक है— चाहे वह वर्दी में हो या बिना वर्दी के। यह कविता नम्र आग्रह नहीं, बल्कि दहाड़ है— एक ऐसा स्वर जो युवा को आराम से उठाकर जिम्मेदारी की आग में खड़ा कर देता है। समर्पण समर्पित: मेरे पिता — श्री एस. पी. एस. सिरोही यह कविता मेरे पिता श्री एस. पी. एस. सिरोही को समर्पित है— जिन्होंने शब्दों से नहीं, जीवन से देशभक्ति सिखाई। वे अक्सर ऐसे ही वाक्यों से मेरे भीतर गर्व जगाते थे— जो मुझे केवल भारतीय नहीं, एक जिम्मेदार भारतीय बनाते थे। उनकी सीख ने मुझे बताया कि देशभक्ति उत्सव की चीज़ नहीं, दैनिक आचरण की साधना है। जो रुद्र स्वर इस कविता में है, वह कहीं न कहीं उनके ही शब्दों, मूल्यों और संस्कारों की प्रतिध्वनि है। यह रचना मेरे होने पर नहीं, मेरे संस्कारों के स्रोत पर नमन है। — पुष्प सिरोही 🇮🇳
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