इनायत Poem by Rajeev Deshpande

इनायत

खाना खिलाती मिट्टी
जिंदा रखती हवा
प्यास बुझाता पानी
समय दुखकी दवा

जगह जगह डगरपर
जिंदगानी का जलवा
रोजीरोटीकी फिराकमे
निकलता है कारवाॅ

रातकी सिहाईमे
सपने होते है धुआं
निकलतेही दिन
फिर उम्मीद जवॉं

मंजिलोकी जुस्तजुमे
जिंदगी बनी जुआं
निचे झुकता है सिर
आती उपरसे दुआं

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