एक रेत का महल Poem by Dr. Sandeep Kumar Mondal

एक रेत का महल

कामयाब बनने की जद्दोजहत,
इंसान बने ना बने सही,
एक रेत का महल और एक लहर,
की मैं हूँ भी और कुछ भी नहीं |

समाज के थोपे गए कानून,
मुश्किलों से जूझने के नुस्खे,
छलना और खुद छल जाना,
फितरत बन गए हैं उसके,

एक नशा नशे में चूर,
इंसानियत रहे ना राहे कहीं,
एक रेत का महल और एक लहर,
की मैं हूँ भी और कुछ भी नहीं |

दो चार लोगों का संगत,
प्रतिस्पर्धा के रौद्र चेहरे,
सिद्धांतो पे जमी धूल,
अनुशासन हैं प्रेतों के पहरे,

गरिमा प्रदर्शित हर जगह,
पारंगत हो ना हो सही,
एक रेत का महल और एक लहर,
की मैं हूँ भी और कुछ भी नहीं |

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Dr. Sandeep Kumar Mondal

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dhanbad, jharkhand
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