तुम हो कही, मेरे पास ही
मैं महसूस करता हूं सदा !
तुम जुनून हो मेरे प्रभू,
मैं गान करता हूं सदा! !
जहा आन पड़ी विपदा कोई,
सिरहाने तुझको पाया है!
हुआ नाश उस विपदा का भी,
और मुझे सहर्ष हर्षाया हैं! !
मैं नित गीता का पाठ कर्ता
फिर, अपने काम करता!
मैं पहले आपका ध्यान करता,
फिर संस्थान को कुच करता! !
रुका जीवन के किसी मोड़ पर,
तो आपने है वेग दिया!
आप आ न सके मेरे पास में तो,
मां बाप को है भेज दिया! !
हूं देखता जब पापा की छवि,
मुझे आप उनमें दिखते हो!
मेरी हार के मार्गदर्शन में,
मेंरी मां के रूप में चमकते हो! !
मैं निकलता हूं जब लक्ष्य पाने,
समीप एक शक्ति पता हूं! !
मैं अपने चिकित्सक के सपने में,
पहले कृष्ण भक्ति ही पाता हूं! !
क्या होता है प्रेम जीवन में
मैने आपसे ही जाना है!
दुनिया जो दिखला रही है अभी,
वो बस बेमतलब का फ़साना है! !
मैं धन्य हूं मेरे आराध्य प्रभु
जो मेने आप को पहचाना है!
मैने मित्र, पिता, माता, गुरु
इनमे आपको ही जाना है! !
-कवि: - सांखी सुनिल शर्मा ❣️
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