स्मृतिपथ Poem by Saurabh Pandey

स्मृतिपथ

जो टूट गया, वह स्वप्न गया,
जो छूट गया, वह अपना था।
पर जीवन की इस राहों में
हर दर्द कहीं एक सपना था।

कल धूप गई तो क्या ग़म है,
आज चाँद नया फिर आएगा,
सूखी शाखों की बाहों में
फिर कोई पत्ता गाएगा।

जो हार मिली, वह सीख बनी,
जो आँसू थे, संदेश बने,
पत्थर जैसे कठिन दिनों से
मन के भीतर परिवेश बने।

तू रुक मत बीते मौसम पर,
हर साँझ नई सुबह लाती,
जो बीत गई, वह धूल हुई,
अब आगे की राह बुलाती ।

लेखक: - सौरभ पाण्डेय

स्मृतिपथ
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