तुम हो काशी की गंगा सी Poem by Shashank mishra

तुम हो काशी की गंगा सी

तुम हो काशी की गंगा सी, तुम हो उपवन की चंचलता |
तुम चित्रकूट कि शीतलता, तुझमे ही तो सूरज चंदा ||
तुम सुन्दर दिखती पुस्तक सी, तुम हो पुस्तक की जटिलता |
अब मैं तुमको ढूँढू कैसे, तुम हो संसार की व्यापकता ||
~शशांक

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
You can buy this
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success