तुम हो काशी की गंगा सी, तुम हो उपवन की चंचलता |
तुम चित्रकूट कि शीतलता, तुझमे ही तो सूरज चंदा ||
तुम सुन्दर दिखती पुस्तक सी, तुम हो पुस्तक की जटिलता |
अब मैं तुमको ढूँढू कैसे, तुम हो संसार की व्यापकता ||
~शशांक
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