(मंच मंद रोशनी में डूबा है, एक अकेला पात्र केंद्र में खड़ा। कमरे में केवल एक उलटी पड़ी कुर्सी है। उसकी आवाज़ पहले धीरे और कांपती हुई है, फिर दर्द और रोष के साथ तेज़ होती है।)
यह सब इतनी जल्दी हुआ—
इतनी अचानक,
कि दिमाग़ इसे मानने से इंकार कर देता है।
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