संघर्ष Poem by Sneha Sneha

संघर्ष

ज़िन्दगी आसान नहीं होती।

जिस तरह एक बगीचे को बनाए रखने के लिए उसकी देखभाल करनी पड़ती है,
उसी तरह जीवन को सँवारने के लिए संघर्ष ज़रूरी है।

ज़िन्दगी आसान नहीं होती।

हर दिन जलना पड़ सकता है आपको — एक दिन के लिए।
कई बार दबाने पड़ते हैं आँसू,
हर बार किसी को हँसाने के लिए।
कहना पड़ता है कई बार — "मस्त है हाल।"

लगता है कई बार — गलत में ही हूँ,
पर चलो, गलत ही सही, हूँ तो सही।
मैं ही हूँ… क्या सच में मैं ही हूँ?

खो जाता हूँ मैं कई बार —
खुद से ही, खुद में ही, खुद के लिए ही।
पर हर बार भूल जाता हूँ मैं खुद को ही।
हो जाती है घुटन मुझे खुद से ही।
क्या हो जाऊँ मैं इस जहाँ से आज़ाद?
क्या बिना संघर्ष के मैं हो जाऊँगा आज़ाद, या हो जाऊँगा बर्बाद?
लगता है हो जाऊँगा मैं आज़ाद, पर हो न पाऊँगा आबाद।

ज़िन्दगी आसान नहीं होती।

हार जाता हूँ मैं कई बार,
रो देता हूँ मैं हज़ार बार।
"हार न मानना ही है — क्या मेरी हार? "
आते हैं मुझे ऐसे विचार हर बार,
कहीं हो न जाए मेरी हार।

हार और जीत तो हैं — केवल मन के विचार।
संघर्ष से अब डरना कैसा?
बिना संघर्ष के जीना-मरना कैसा?
संघर्ष से भागना कैसा?

जीवन में संघर्ष न होना भी
हो सकता है संघर्ष, कई बार।

इसलिए…

मानता नहीं है वह हार,
जो हार करके भी हारा नहीं।
इतिहास में वे जीत करके भी जीते नहीं,
जो हार करके भी हारे नहीं।

ज़िन्दगी आसान नहीं होती,
पर संघर्ष का है जीवन …
इसलिए, कभी हारा नहीं।

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