नींव ढह जाना (The Bottom Fell Out) (एक नाटकीय एकालाप) Poem by ashok jadhav

नींव ढह जाना (The Bottom Fell Out) (एक नाटकीय एकालाप)

(मंच कम रोशनी में। एक अकेला पात्र बीच में खड़ा है, चारों ओर काग़ज़ बिखरे हुए, एक कुर्सी उलटी पड़ी। माहौल भारी और तनावपूर्ण है। उसकी आवाज़ धीरे-धीरे शुरू होती है, कांपती हुई, फिर धीरे-धीरे तेज़ और तीखी होती है।)
यह सब इतनी जल्दी हुआ—
साँस लेने से भी तेज़।
एक पल मैं ठोस ज़मीन पर चल रहा था,
सब कुछ परिचित, सब कुछ अपनी जगह।
कदमों में आत्मविश्वास।
योजनाएँ नक़्शे जैसी व्यवस्थित।
जीवन… अनुमानित।
और फिर—
नींव ढह गई।
(वह हाथ फैलाता है, जैसे कोई अदृश्य सहारा पकड़ रहा हो।)
एक फ़ोन कॉल।
एक बैठक।
एक झलक।
और अचानक, कुछ भी समझ में नहीं आया।
सालों की सावधानीपूर्वक तैयारी
कुछ ही पल में बिखर गई।
जो दीवारें मैंने अव्यवस्था को रोकने के लिए बनाई थीं
वो धीरे से टूट गईं।
(वह कड़वी हँसी हँसता है।)
मैंने आते हुए संकेत भी नहीं सुने।
कोई दरार नहीं, कोई चेतावनी नहीं।
बस—
ख़ामोशी।
और फिर सब कुछ खो जाने की प्रतिध्वनि।
(वह झुककर बिखरे हुए काग़ज़ उठाता है।)
क्या तुम जानते हो वह अनुभव कैसा होता है?
जिस ज़मीन पर तुम भरोसा करते हो—
वह चली गई।
जिस भविष्य की तुमने योजना बनाई—
वह छिन गई।
हर निश्चितता, जो तुमने थाम रखी थी—
एक पल में बिखर गई।
मैंने पकड़ने की कोशिश की।
मैंने खुरचाई, मैंने याचना की, मैंने तर्क किया।
लेकिन गुरुत्वाकर्षण समझौता नहीं करता।
यह मेहनत की परवाह नहीं करता।
यह केवल लेता है जो लेना है।
(वह खड़ा होकर इधर-उधर चलता है।)
नींव ढह गई…
और उसके साथ, मैं भी गिर गया।
न केवल योजनाएँ, न केवल संपत्ति, न केवल अहंकार—
मैं अपने भीतर गिर पड़ा।
सवालों में।
निराशा में।
समझ में।
कि जीवन कभी भी उतना ठोस नहीं होता जितना हम सोचते हैं।
(वह रुकता है, आवाज़ नरम हो जाती है।)
फिर भी…
शायद यह रहम का रूप है।
क्योंकि जब नींव ढह जाती है,
हम देखते हैं कि सच में क्या महत्वपूर्ण है।
साज-सज्जा, दिखावा, नियंत्रण—
सब बेकार।
सिर्फ़ साँस, सिर्फ़ चुनाव, सिर्फ़ सहनशीलता बचती है।
(वह कुर्सी उठाता है और धीरे-धीरे सीधा करता है।)
मेरे पास अब केवल टुकड़े हैं।
इसलिए नहीं कि मैं असफल हुआ,
बल्कि इसलिए कि मुझे सबकुछ की नाज़ुकता दिखानी थी।
याद दिलाने के लिए कि
सबसे मज़बूत संरचनाएँ भी
एक पल में गायब हो सकती हैं।
(ठहराव। वह ऊपर देखता है, आवाज़ दृढ़।)
तो हाँ… नींव ढह गई।
हाँ… अव्यवस्था ने सब कुछ घेर लिया।
हाँ… मैं लड़खड़ा गया।
लेकिन मैं उठता हूँ।
टुकड़े-टुकड़े करके।
क्योंकि ढहना अंत नहीं है।
यह खुलासा है।
पुनर्निर्माण का आह्वान।
आँखें खुली करके।
विनम्रता के साथ।
यह जानते हुए कि ठोसपन
कभी गारंटीकृत नहीं होता।
(वह गहरी साँस लेकर दोनों हाथ ऊपर उठाता है।)
और जब मैं फिर उठूँगा,
मैं और समझदार उठूँगा।
मज़बूत।
न अहंकार में।
न नियंत्रण में।
बल्कि स्वीकृति में।
तैयार उन अप्रत्याशित घटनाओं के लिए
और उस नींव के लिए
जो शायद फिर कभी ढह जाए।
(रोशनी धीरे-धीरे बुझती है। मौन।)

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