(मंच कम रोशनी में। एक अकेला पात्र बीच में खड़ा है, चारों ओर काग़ज़ बिखरे हुए, एक कुर्सी उलटी पड़ी। माहौल भारी और तनावपूर्ण है। उसकी आवाज़ धीरे-धीरे शुरू होती है, कांपती हुई, फिर धीरे-धीरे तेज़ और तीखी होती है।)
यह सब इतनी जल्दी हुआ—
साँस लेने से भी तेज़।
एक पल मैं ठोस ज़मीन पर चल रहा था,
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