"मास्टर जी" (एक बेटे के दिल से)
मास्टर जी…
आपका नाम लेते ही
मेरे भीतर
एक अनुशासन जाग जाता है,
जैसे रूह में
किसी ने दीपक
जला दिया हो।
आपकी आवाज़
आज भी मेरी सोच में है—
कभी सलाह बनकर,
कभी डाँट बनकर,
कभी चुपचाप
मेरे कंधे पर
हिम्मत रखकर।
मास्टर जी…
आपने सिखाया था—
ज़िंदगी छोटी नहीं,
सोच छोटी होती है।
और इंसान का क़द
उसके पैरों से नहीं,
उसके उसूलों से नापा जाता है।
आपने कहा था—
"कभी अपने आत्म-सम्मान को
सस्ते में मत गिरने देना।"
वो बात
आज भी मेरे भीतर
तलवार की तरह चमकती है।
आपने मुझे
सिर्फ़ चलना नहीं सिखाया,
ठहरकर सही चलना सिखाया।
आपने मुझे
सिर्फ़ बोलना नहीं सिखाया,
कम बोलकर भारी रहना सिखाया।
आपने मुझे
भीड़ की आदत नहीं दी—
आपने मुझे
अपने रास्ते की
पहचान दी।
मास्टर जी…
जब मैं बिखरता हूँ,
तो आपकी सीख
मुझे जोड़ देती है।
जब मैं थकता हूँ,
तो आपका वाक्य
मेरे अंदर
जूनून भर देता है—
"बेटा,
टूटना मना नहीं…
रुक जाना मना है।"
कभी-कभी
किसी मोड़ पर
मैं अकेला लगता हूँ…
फिर अचानक
आपकी कही हुई
एक बात याद आती है,
और मेरा डर
शर्मिंदा हो जाता है।
आपका सिखाया
सब कुछ
मेरे भीतर
समंदर की तरह है—
शोर कम करता है,
पर गहराई से
सब कह जाता है।
मास्टर जी…
आपने मुझे बताया—
कर्म ही पहचान है,
और चरित्र ही
सबसे बड़ा सम्मान।
इसलिए आज
जब दुनिया पूछती है
"तू किसका शागिर्द है? "
तो मेरा दिल कहता है—
"मैं मास्टर जी की सीखों का बेटा हूँ।"
मेरी हर जीत में
आपका अनुशासन है,
मेरी हर कोशिश में
आपका भरोसा है,
और मेरी हर प्रार्थना में
आपका नाम
दीये की तरह जलता है।
आप मेरे लिए
सिर्फ़ शिक्षक नहीं…
आप
पिता जैसी ताक़त हैं।
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