Suryakant Tripathi 'Nirala'

(21 February 1896 – 15 October 1961 / Midnapore, West Bengal / British India)

तोड़ती पत्थर - Poem by Suryakant Tripathi 'Nirala'

वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने इलाहाबाद के पथ पर -
वह तोड़ती पत्थर ।

कोई न छायादार
पेड़, वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
गुरु हथौड़ा हाथ
करती बार बार प्रहार;
सामने तरु - मालिका, अट्टालिका, प्राकार ।

चड़ रही थी धूप
गरमियों के दिन
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू
गर्द चिनगी छा गयी

प्रायः हुई दुपहर,
वह तोड़ती पत्थर ।

देखते देखा, मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा छिन्न-तार
देखकर कोई नहीं
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोयी नहीं
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार ।
एक छन के बाद वह काँपी सुघर,
दुलक माथे से गिरे सीकार,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा -
'मैं तोड़ती पत्थर'


Comments about तोड़ती पत्थर by Suryakant Tripathi 'Nirala'

  • (7/17/2018 9:51:00 AM)

    Good poem (Report)Reply

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  • (1/3/2018 9:42:00 AM)

    wowwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwwww! (Report)Reply

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  • (12/3/2015 1:48:00 AM)

    Badhiya, ati uttam kavita (Report)Reply

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Poem Submitted: Sunday, April 1, 2012

Poem Edited: Sunday, April 1, 2012


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