ऐ प्रकृति! क्या लिखूं तेरे अस्तित्व पर, ऐ प्रकृति! क्या लिखूं तेरे अस्तित्व पर।। मेरे स्वयं की आत्मा तुझसे है, तेरे महत्व का डंका सबसे है। वो छिपा हुआ पर्वत तेरे रूह के अंश में, बैठे खेत में मैं निहार रही थी। मन में तेरी मासिक माया को कोमलता से पुकार रही थी। एक तारु के नीचे अपने जीवन पर विचार करूं, ए प्रकृति! तूने दिया यह जीवन तो तेरी गोद में ही मरू।। हरा हरा हरा यह चोला तेरा उमंग है कितने चेहरों का, , तेरी अनंत आकांक्षा प्राण है ग्राम और शहरों का।। यह सुंदर-सुंदर धरा रूपी बदन पर जब अचानक वायु आती है, , कर्ण के पास की ध्वनि को स्वर्णिम बन सहलाती है।। मिटा देती है तू बड़े आराम से हर जीव के विभेद को, तपोवन कर देती है तू हर जल और खेत को।। कहीं मर पेड़ की तलहटी पर बैठ तेरा स्मरण करता है, कहीं बांधना डाली पर देवबंद प्रकृति चिंतन करता है। मानव तेरे अश्रु को देख मुक्त मनित होता है, तेरे जादू से जन-जन आश्चर्य चकित हो खोता है। धुन सुनो तेरे भक्तों के गुणगान की, कहीं पीहू पीहू चू चू चू के आवाज की। मेरा मस्तिष्क हरित हो गया रे! ! ! ! तेरे स्वरों को अपनाकर, ये बालक धन्य हो गया रे! ! ! तेरी गोद में जन्म पाकर।।।। ये बालक धन्य हो गया रे! ! ! तेरी गोद में जन्म पाकर।।।🦚🦚🏞️
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