माँ...
वो पहली आवाज़ जो मैंने बिना बोले सुनी,
वो पहला स्पर्श, जिसमें सुकून की गर्मी बसी।
ना उसने किताबें पढ़ीं, ना बड़े स्कूल देखे,
पर उसकी ममता ने ज़िंदगी के सारे उसूल लिखे।
जब मैं गिरा, उसने खुद को थाम लिया,
मेरे दर्द को अपने सीने में आराम दिया।
भूख मुझे लगी, पर रोटी उसने नहीं खाई,
अपने आँसू छुपा, मेरे होंठों पे हँसी लाई।
बचपन में जो पाँव पकड़कर चला था मैं,
आज उसी माँ के लिए वक़्त भी नहीं निकाल पा रहा मैं।
वो दिन भर काम करके थक जाती है,
पर फिर भी 'तू ठीक है ना बेटा? ' पूछना नहीं भूलती है।
उसकी ममता किसी मंदिर की आरती से कम नहीं,
उसकी बातें किसी गुरूवाणी से कम नहीं।
बाप दुनिया से लड़ता है,
पर माँ तेरे लिए खुदा से रोज़ झगड़ती है।
कभी उसकी झुकी कमर को देखो,
हर साल उसने एक सपना उठाया है।
कभी उसके फटे पल्लू को पढ़ो,
हर धागे में उसने एक ख्वाब सिलवाया है।
मैं बड़ा हो गया, पर उसकी आँखों में अब भी वही बच्चा हूँ,
जिसे रात को लोरी सुनाकर सुलाती थी - 'सो जा मेरा राजा हूँ'।
आज जब वो चुप रहती है, तो समझ नहीं आता,
क्या कहूं उससे... जब उसके त्याग का कोई मोल नहीं बता पाता।
माँ कोई भगवान नहीं,
वो खुदा से भी बड़ा एहसास है।
जो भी मैं आज हूँ,
उसके हर त्याग का हिसाब है।
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