Vikram Beniwal Poems

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आदमी _Vki3_

'अकेले बैठा हंसता है खिलखिलाता है सोता है खूब खाता है आदमी।
सबके सामने हंसते-हंसते और आंसू छुपाते ऊब जाता है आदमी।

जब सुनने वाले बहुत हों समझने वाला कोई नही तब खुद ही बुदबुदाता है आदमी।
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