sanjay kumar maurya

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तनहा प्रेमी - Poem by sanjay kumar maurya

संसार होता है
जब नींद में मग्न
दिन भर के उथल पुथल से
जुदा होकर शान्ति की सानिग्द्य में
तब कोई आंखे जागकर
कल्पना के जग में लवलीन
अंधेरे में कमरे के उपर छत पर
दृष्टि कहीं शून्य में टिकाए
कुछ न देखते हुए भी देखती है
अपने प्रियवर को अल्हड़ता के साथ
न बातें करते हुए भी वो करता है बातें
नटखटापन के साथ
अपने प्रियवर से
और करते करते सो जाता है
जैसे एक नन्हा सा बच्चा
लेटकर छत को देखते देखते
व मुस्कुराते खेलते हुए सो जाता है
कब कैसे ज्ञात ही नहीं होता
एक तनहा प्रेमी
किसी की याद में

Topic(s) of this poem: love


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Poem Submitted: Wednesday, September 2, 2015



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