sanjay kumar maurya

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मेरे वो गम - Poem by sanjay kumar maurya

मेरे वो गम पुराने हो नहीं पाये
चैन से हम अभी तक सो नहीं पाये

यों सफर चलते हुए छिंटे लगे थे कि
कोशिशें लाखों किये पर धो नहीं पाये

दामन छुडा़ना दिल को हर मुमकिन हुआ तो था
जितनी चाहीं दूरियां वो लौटकर आये

उसके प्यार से महरुम तो हो ही गया लेकिन
दिललगी हिस्से की अपनी खो नहीं पाये

मुहब्बत में सिवा मेरे हुआ नुकसान उनको भी
मैनें खो दिया उनको तो मुझको वो नहीं पाये

Topic(s) of this poem: love and pain


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Poem Submitted: Thursday, September 3, 2015



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